गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

इसका मलाल है !

कहते हैं लोग गीत मेरे बेमिसाल हैं
तुमने मुझे जो गम दिए उनका कमाल है !

दोस्त तो कई मिले जीवन के सफर में
तुझसा न था कोई यही मेरा खयाल है ...

ऐसा नहीं कि बिन तेरे जीना मुहाल है
अफसोस ये, पता नहीं तेरा क्या हाल है ?

तुम छोड़कर चले गए, इसका भी गम नहीं
बस बोलकर नहीं गए, इसका मलाल है...

ना रोए, ना बोले , ना किसी से किया शिकवा
फिर भी हमारे हाल पर क्यूँ ये बवाल है ?

कहते हो तुम कि अब नहीं तुमको मेरी गरज़
तकदीर के शतरंज पर ये किसकी चाल है ? 

हमने जो रंगमंच पर किरदार निभाया
कैसा रहा , ये हाज़िरीन से सवाल है ...







बुधवार, 7 जनवरी 2026

जानकर कौन भला, मोल इसे लेता है

जब भी मैंने कभी, दिल उसका दुखाया होगा
चोट का इक निशां, मेरी रूह पे आया होगा !

जानकर कौन भला, मोल इसे लेता है 
ये मुहब्बत का मर्ज़ खुद चला आया होगा !

मेरे दिल पर लगे, ज़ख्मों को अगर गिन पाओ
करो हिसाब  कि, कितनों ने दुखाया होगा !

अपनी आँखों के आँसुओं को, छिपाने खातिर
एक लतीफ़ा तेरी, महफ़िल में सुनाया होगा  !

मैंने इक हाथ से ये गीत लिखे उसके लिए
पर दुआ में तो, दोनों को उठाया होगा !

ख़ुदा गवाह, इबादत के कुछ लम्हों के सिवा,
एक पल के लिए , तुझको ना भुलाया होगा !

किसी जनम का कहीं, होगा बकाया कुछ तो,
बेसबब तो नहीं, कुदरत ने मिलाया होगा !






















मंगलवार, 6 जनवरी 2026

ये पंछी कहाँ से आते हैं ?

बच्चों द्वारा दिया गया सरप्राइज








          
ये पंछी कहाँ से आते हैं
और दूर कहाँ उड़ जाते हैं
हम इनके गीतों को सुनते,
सपने बुनते रह जाते हैं !

इस उपवन में पलते बढ़ते,
उड़ते हैं ऊँचे नील गगन,
ये डाली - डाली,फुदक - फुदक,
फिरते हैं होकर मस्त मगन !
ये पंछी हैं मेहमानों - से,
पहले लगते अनजानों से,
पर संग इनके रहते - रहते,
हम खुद इनसे जुड़ जाते हैं !

ये पंछी कहाँ से आते हैं
और दूर कहाँ उड़ जाते हैं ?

पंखों को ताकत से भरकर,
अपना दाना पानी चुगकर,
छूने को नभ की ऊँचाई,
निकलेंगे ये घर से बाहर !
जीवन की ये है सच्चाई,
रस्ता ना कोई पूरा सीधा,
बदलेंगी सबकी ही राहें,
सारे रस्ते मुड़ जाते हैं  !

ये पंछी कहाँ से आते हैं
और दूर कहाँ उड़ जाते हैं ?
     
आज मेरी कक्षा ( दसवीं ) के बच्चों को शालेय जीवन से विदा देते हुए मन में कुछ भाव उमड़ आए, जो इस गीत के रूप में अभिव्यक्त हुए ......





शनिवार, 3 जनवरी 2026

बिगड़े जो कभी बात तो...

व्यवहार बदल देते हैं औकात देखकर
मुंह फेर लेते, लोग हैं हालात देखकर !

रिश्तों की इस बाजार में , लगती हैं बोलियाँ
करते हैं लेन - देन, मोल - भाव देखकर !

मानक है यहाँ प्रेम का, बस देह का मिलन
तुम क्या करोगे , नयनों की बरसात देखकर !

वो भी चला गया है थाम हाथ किसी का
हँसते हैं लोग अब मेरे जज़बात देखकर !

वो छोड़कर चले, जो कभी हमकदम रहे
मेरी तबीयत को जरा, नासाज देखकर !

बिगड़े जो कभी बात तो आवाज लगाना
हम वो नहीं जो साथ दें खुशहाल देखकर !








मंगलवार, 1 जुलाई 2025

विचित्र लोग

बड़े विचित्र होते हैं कुछ लोग
भटकते हैं प्रेम की तलाश में
लेकिन अहं इतना प्रबल होता है
कि स्वीकार नहीं कर पाते
ना ही जता पाते हैं किसी तरह
बस आँकते रहते हैं, मापते रहते हैं
या तौलते रहते हैं अपने ही प्रेम को !

इनके पास प्रेम को तौलने का
विचित्र तराजू है
जिसमें दो नहीं, अनेक पलड़े हैं
तराजू के उन पलड़ों में रखा प्रेम
कभी कहीं अधिक हो जाता है
तो कभी कहीं ! 
विचित्र स्थिति !
फिर ये संतुलन बनाने की कोशिश में
इधर से थोड़ा प्रेम कम करके
दूसरी तरफ के पलड़े में डालते हैं....

प्रेम के तराजू का नियम या सिद्धांत
विज्ञान के नियमों से उलटा है
यहाँ ज्यादा वाले का स्थान ऊँचा है
और कम वाले का नीचे !
जब पाते हैं कि उधर बढ़ गया 
और वो वाला पलड़ा तो
सिर पर चढ़ गया !
तब इधर थोड़ा-थोड़ा बढ़ाते ,
उधर से थोड़ा निकालकर !

ना जाने इनकी चाह क्या है
ये खुद भी नहीं समझ पाते,
ना ही दूसरों को समझा पाते 
किसी को किसी रिश्ते में बाँधते
तो किसी को किसी रिश्ते में,
बिना रिश्तों का प्रेम इनके लिए
बेमानी और निरर्थक होता है
होता है अस्तित्वहीन !

इसी असंतुलन को
संतुलित करते - करते 
बीत जाता है जीवन और
छूट जाता है तराजू
टूटकर बिखर जाते हैं सारे पलड़े 
हाथ नहीं आता है कहीं भी,
कुछ भी, कोई भी !
कब समझेंगे ये
कि प्रेम का कोई मापदंड नहीं होता !












शुक्रवार, 27 जून 2025

पुनः बसंत लिखूँगी !

पतझड़ के मौसम में झड़ते
पात - पात की पीड़ाओं को,
झंझा की झकझोरों से
झरने वाली कच्ची कलियों को,
लिखने वाले खूब लिख गए,
मैं पतझड़ का अंत लिखूँगी !
          मैं तो पुनः बसंत लिखूँगी  !

आग नफरतों की जब फैली
दावानल में देश जल उठा,
राजसभा जनसभा, फर्क क्या
चीरहरण का दृश्य वही था ।
अब पांचाली के हाथों से 
दुर्योधन का अंत लिखूँगी !
         मैं तो पुनः बसंत लिखूँगी  !

हर युग में पैदा होते हैं
रावण, कंस और दुःशासन, 
कुछ जनता का शोषण करते
कुछ जनता पर करते शासन !
उनका महिमा-मंडन ना कर,
दुष्टों का विध्वंस लिखूँगी ।
        मैं तो पुनः बसंत लिखूँगी  !

बंसी के वह मृदुल मधुर स्वर
जो गूँजे थे यमुना तट पर
मेरे स्मृति पटल पर अंकित
कृष्ण सखी के बजते नुपूर
महाभारत तो कई लिख गए
मैं तो केवल कृष्ण लिखूँगी
         मैं तो पुनः बसंत लिखूँगी  !

जाति - धर्म बनने से पहले
वाला युग लिखना चाहेगी,
मेरी कलम सिर्फ मानव की
कर्म - कथा कहना चाहेगी,
मानवता की चिर यात्रा का
सुंदर, सदय, सुअंश लिखूँगी !
          मैं तो पुनः बसंत लिखूँगी  !
          












गुरुवार, 20 मार्च 2025

हमारी समझ ना आए

जीवन का यह गणित हमारी समझ ना आए !
जोड़ - घटा का फलित हमारी समझ ना आए !

कभी एक के जुड़ जाने से ,
खुशियाँ सहस गुना हो जाती !
कभी एक का ही घट जाना , 
सब कुछ शून्य बना जाता है ।
हिम्मत को सौ गुना बनाता ,
एक हाथ का हाथ पकड़ना 
दुःख को कई गुना कर देता ,
बिन गलती के सजा भुगतना ।

समीकरण अभिमान - स्वार्थ के
कर देते हैं चकित, हमारी समझ ना आए !
जीवन का यह गणित हमारी समझ ना आए ।

अजब हिसाब लाभ - हानि का,
देन लेन की गज़ब है गणना
किसके साथ बनाना आयत,
किसके साथ वृत्त की रचना ।
क्ष का मान बढ़ाना हो तो,
य का मान कहाँ कम करना
प्रतिच्छेदी रेखाओं का कब,
किस बिंदु, किस कोण पे कटना ?

क्या यह सब पहले से तय है ?
कैसे होता घटित, हमारी समझ ना आए !
जीवन का यह गणित हमारी समझ ना आए ।

दो में करके हृदय विभाजित, 
क्यों खुद को आधा करता है
सूत्रों के जंजाल में फँसना,
जीवन में बाधा करता है ।
मन से मन की दूरी को,
मन ही तो कम-ज्यादा करता है
एक तीर से कई निशाने,
लक्ष्य कई साधा करता है ।

मानव का यह छद्म वेष, यह
असली - नकली चरित हमारी समझ ना आए !
जीवन का यह गणित हमारी समझ ना आए ।
जोड़ - घटा का फलित हमारी समझ ना आए !


शनिवार, 15 मार्च 2025

हफ्ते भर का चिट्ठा

जैसे कागज की कश्ती
बहती बहते पानी में
वैसे ही दिन बीत रहे हैं
बिन तेरे ओ साथी !

कहता है मन अभी मिलेगा
उसका कोई संदेशा
ना आने से मन बुझ जाता
बिना तेल ज्यों बाती !

बहलाते हैं व्यस्त बनाकर
हम बस अपने दिल को
दिन तो फिर भी कट जाता है
रात ना कटने पाती !

नींद चिरैया बनकर उड़
जाती है पास तुम्हारे
कितनी गहरी निंदिया में 
वह जाकर तुम्हें सुलाती !

और यहाँ नयनों को मूँदे
करते हैं हम नाटक
ना जाने कब नींद लौटकर
सपने हमें दिखाती !

हम सारे संदेश तुम्हारे
सपनों में पढ़ते हैं
सुबह लौटकर आओगे तुम
फिर उम्मीद जगाती !

बहुत हो गई रूठा रूठी
बातें हुई इकठ्ठा
तुम आओ तो खोलेंगे हम
हफ्ते भर का चिट्ठा !







सोमवार, 10 मार्च 2025

जहरी मीडिया

आग लगने की तके है 
राह जहरी मीडिया
घी लिए तैयार बैठा, 
वाह जहरी मीडिया !

धर्म, जाति, कौम के 
रंग में रंगे हर रूह को
विषबुझे तीरों से करता
वार जहरी मीडिया !

चैनलों के कटघरे में 
हैं खड़े राम औ रहीम
कभी वकील है, कभी 
गवाह जहरी मीडिया !

हल निकल सकता जहाँ 
खामोशियों से खुद-ब-खुद
चीखता है बेवजह, 
बेपनाह जहरी मीडिया !

बस दूध के उबाल सा 
उफने है चंद रोज,
पकड़े है फिर अगली खबर 
की राह जहरी मीडिया !

जनता छली जाती रही , 
सच की तलाश में
देता रहा बस मुफ्त की 
सलाह जहरी मीडिया !



शनिवार, 8 मार्च 2025

मैं तुमसे इत्तेफाक नहीं रखती !

ये जो तुम मुझे
भेज रही हो शुभकामनाएँ
महिला दिवस की,
तुम कौन हो ?
मैं तुम्हें नहीं जानती !
मैंने तुमसे कभी 
सहानुभूति नहीं पाई
सहवेदना/ संवेदना तो दूर !
ओ स्त्री, तुम हो कौन ?
माँ, बहन, भाभी, सास
देवरानी, जेठानी, ननद
मेरी सहकर्मी
या मेरी महिला बॉस ?
या मेरी अड़ोसी - पड़ोसी
सखी - सहेली ?
क्या तुमने नहीं बनाई मेरी बातें,
नहीं काटीं मेरी जड़ें ?
नहीं की मेरी चुगली ?
कैसे मान लूँ कि ये मेरा दिवस है
या हमारा दिवस है ?
'हम' शब्द तो उनके लिए
ठीक रहता है जो जुड़े हों
हम तो बँटे ही रहे हमेशा
साथ भी आए कभी, तो 
स्वार्थ के धागे से ही जुड़े थे
कैसा महिला दिवस, कैसी शुभकामना ?
माफ करना ओ स्त्री,
मैं तुमसे इत्तेफाक नहीं रखती !

( ये मेरे अपने विचार हैं, इसके अपवाद भी हो सकते हैं )

रविवार, 23 फ़रवरी 2025

अपने हृदय में अब मुझे विश्राम दो

थक गए कदम, थका - थका है मन,
अपने हृदय में अब मुझे विश्राम दो ।
अनवरत अथक प्रवास को मेरे,
प्रिय ! किसी प्रयत्न से विराम दो ।

परिक्रमा कब तक करेगी सूर्य की,
कब तलक करे स्वयं का परिभ्रमण !
व्योम को निहारती वसुंधरा
काल्पनिक क्षितिज का क्यों करे वरण !
है धरा के धैर्य का अंतिम चरण,
अब गगन को भी कोई आह्वान दो।
अनवरत अथक प्रवास को मेरे
प्रिय ! किसी प्रयत्न से विराम दो ।

समय - सरिता बह रही अविराम है,
हैं हमारी नियति में विपरीत तट !
देह के संदर्भ देना व्यर्थ है,
प्राण के आधार पर यदि हैं निकट !
मैं उगा लूँ पत्थरों पर हरीतिमा
काल के प्रवाह को तुम थाम दो ।
अनवरत अथक प्रवास को मेरे
प्रिय ! किसी प्रयत्न से विराम दो ।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

हम सब कितने बँटे हुए हैं

हम सब कितने बँटे हुए हैं
इक दूजे से कटे हुए हैं !
कब, क्या कहना, किसे, कहाँ पर
सब पहले से रटे हुए हैं !

दिखने को बाहर से दिखते
जैसे बिलकुल जुड़े हुए हैं,
लेकिन जब अंदर झाँको तो
पुर्जे - पुर्जे खुले हुए हैं !
हम सब कितने बँटे हुए हैं ।

तन से कहीं, कहीं हैं मन से
कहीं नयन से, कहीं चितवन से 
देख रहे सारी दुनिया को
पर खुद सबसे छुपे हुए हैं !
हम सब कितने बँटे हुए हैं ।

कितना भी तुम करो समर्पण,
कोई टुकड़ा बचा ही लोगे !
पूरा नहीं किसी का कोई ,
दिल के हिस्से किए हुए हैं !
हम सब कितने बँटे हुए हैं ।

बुद्धि बड़ी, भावना छोटी
फिर इंसान की नीयत खोटी !
उलझन, किस ईश्वर को मानें ?
धर्म - जात में फँसे हुए हैं !
हम सब कितने बँटे हुए हैं ।

हम सब कितने बँटे हुए हैं
इक दूजे से कटे हुए हैं !
कब, क्या कहना, किसे, कहाँ पर ,
सब पहले से रटे हुए हैं !






गुरुवार, 23 जनवरी 2025

साथ

पतझड़ आते ही 
बिछड़ना होता है
पत्तों को अपनी शाख से
बस, कौन सा कब छूटेगा 
यही तय नहीं होता !
जाना सबको है ।

साथी, जो खून के रिश्तों से बनते हैं
और साथी जो दिलों से बनते हैं,
साथ दें, तो साथी हैं
वरना क्या खून और क्या दिल ?
चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों के 
अभ्यास का विषय भर हैं ये !

नसीब निर्धारित करता है
किसको, किसका साथ मिलेगा ।
कभी-कभी, किसी और से 
कर्ज चुकवाने के लिए
किसी का किसी से साथ छूटता है 
या रास्ते ही अलग हो जाते हैं
या खो जाते हैं राही !
फिर कोई और हो जाता है हमराह 

कभी कोई भी नहीं मिलता,
अपना साहस ही देता है साथ
सूरज सर पर हो तो
परछाईं भी साथ छोड़ देती है !


शनिवार, 28 दिसंबर 2024

अब मेरा अधिकार नहीं है

साथ वक्त के दुनिया बदली,
रुत के संग बदला उपवन
रिश्तों की खींचातानी में, 
शिथिल हुए आत्मा के बंधन !
चकाचौंध में चाँदी की 
विस्मरण हुआ अहसासों का,
धूल धूसरित धरती क्या, 
जब चंद्र मिले आकाशों का !
जिस दुनिया ने तुम्हें लुभाया, 
वह मेरा संसार नहीं है !
तेरी पीड़ाओं पर साथी, 
अब मेरा अधिकार नहीं है !

है अपूर्व अनुराग अभी भी, 
किंतु राग का मरण हुआ
भाव अनंत भरे हैं मन में, 
अभिव्यक्ति का क्षरण हुआ !
तेरे पदचिन्हों का मुझसे 
अनजाने अनुकरण हुआ,
शायद कुछ पिछले जन्मों के 
अनुबंधों का स्मरण हुआ !
लेख लिखा है यह विधना ने, 
यह कोई व्यापार नहीं है!
तेरी पीड़ाओं पर साथी, 
अब मेरा अधिकार नहीं है !

सागर में बहते-बहते, 
दो काष्ठ-फलक टकराते हैं
निर्धारित है काल यहाँ ,
संग-संग कितना बह पाते हैं !
किसको वहीं अटक जाना है,
किसको आगे बढ़ना है ?
लहरों की मर्जी पर उनका, 
मिलना और बिछड़ना है !
कैसे साथ निभाते दोनों, 
जब कोई आधार नहीं है
तेरी पीड़ाओं पर साथी, 
अब मेरा अधिकार नहीं है !

सोने-चाँदी धन-दौलत 
हर दोष छिपा ले जाते हैं,
धनहीनों के ही चरित्र पर 
उँगली लोग उठाते हैं !
सारी मुस्कानें हैं तेरी, 
तेरा सब उजियारा है
मेरे अश्रू छुपानेवाला 
बस मेरा अंधियारा है !
अभिनय से अभीष्ट पा लेना, 
यह मेरा व्यवहार नहीं है
तेरी पीड़ाओं पर साथी, 
अब मेरा अधिकार नहीं है ?






सोमवार, 16 सितंबर 2024

गणपति बाप्पा, मत जाओ ना !


( गणपति अपने गाँव चले, कैसे हमको चैन पड़े )

ग्यारह दिन ऐसे बीते हैं ,
जैसे बीते ग्यारह पल !
गणपति बाप्पा मत जाओ ना,
कहते होकर भाव विह्वल !

इंतजार फिर एक बरस का ,
हमको करना पड़ता है 
सुंदर सुंदर रूप तुम्हारे ,
तब कारीगर गढ़ता है ।
सबसे प्यारी सूरत चुनकर
अपने घर हम लाते हैं ,
तरह तरह के साज सजाकर
बप्पा तुम्हें मनाते हैं ।
कैसे करें विदा हम तुमको ,
हो जाते हैं नयन सजल !
गणपति बाप्पा मत जाओ ना,
कहते होकर भाव विह्वल !

कुछ ही दिन की खातिर बप्पा,
मेरे घर तुम आते हो !
मेरे सुख - दुःख के साथी,
इतने में ही बन जाते हो ।
अभी और भी कितने किस्से,
बप्पा तुम्हें बताना था 
लेकिन तुमको तो, जिस दिन
जाना था, उस दिन जाना था ।
अगले बरस जल्दी आओगे ,
सोच के यह मन गया बहल !
गणपति बाप्पा मत जाओ ना,
कहते होकर भाव विह्वल !

कैसे करें विदा हम तुमको ,
हो जाते हैं नयन सजल !
ग्यारह दिन ऐसे बीते हैं ,
जैसे बीते ग्यारह पल ! ! !


रविवार, 15 सितंबर 2024

तुम मेरे गीतों को गाना !

मनवीणा के, मौन स्वरों को
साथी, झंकृत करते जाना,
जब तक श्वासों में सरगम है,
तुम मेरे गीतों को गाना ।

इन्हें गाते गाते, नयन नम ना करना,
इन्हें गुनगुनाते सदा मुस्कुराना  !
ये सुरभित सुमन तुमको सौंपे है मैंने
हृदय के सदन में, इनको सजाना !
ये जब सूख जाएँ, इन्हें भाव से तुम
स्मृतियों  की गंगा में, साथी बहाना !
जब तक श्वासों में सरगम है,
तुम मेरे गीतों को गाना !
मनवीणा के, मौन स्वरों को
साथी, झंकृत करते जाना ।

धरोहर नहीं ये, नहीं कोष कोई,
इन्हें खर्च कर दो, इन्हें बाँट दो तुम !
नहीं पाश कोई, हैं ये नेह डोरी
जो लगते हों बंधन, इन्हें काट दो तुम !
है क्या इनका नाता तुम्हारे सुरों से,
कभी कोई पूछे तो उसको बताना !
जब तक श्वासों में सरगम है,
तुम मेरे गीतों को गाना !
मनवीणा के, मौन स्वरों को
साथी, झंकृत करते जाना ।









शनिवार, 24 अगस्त 2024

कभी हो समय तो...

मेरे टूटने की ना चिंता करो तुम,
हजारों दफा टूट कर मैं जुड़ी हूँ !
जुड़ी तो जुड़ी, जोड़ती भी रही जो, 
विधाता के द्वारा गढ़ी, वह कड़ी हूँ !

उन्हें तुम सँभालो,जो हैं नर्म-ओ-नाजुक
उन्हें प्यार दो, जो हैं झोली पसारे !
अगर मेरे दिल ने गलत कुछ किया है,
तो उसको कोई दूसरा क्यूँ सँभाले ?

नहीं दोष इसमें किसी का भी कोई
मैं सब छोड़, जाने कहाँ को मुड़ी हूँ !

ये हैं किस जनम के, बँधे कर्मबंधन
मेरी रूह ने कब लिए थे वो फेरे ?
मैं बेचैन, पागल, फिरी खोज में, पर
कदम-दर-कदम थे अँधेरे, घनेरे !

किसी मोह की डोर में यूँ उलझकर   
न फिर लौट पाई, ना आगे बढ़ी हूँ !

है ख्वाहिश, तुम्हें वह मिले तुम जो चाहो,
पहुँचती रहें तुम तलक सब दुआएँ !
सुकूँ-चैन, खुशियों की हो तुम पे बारिश,
मैं लेती रहूँ सब तुम्हारी बलाएँ !

कभी हो समय तो नज़र डाल लेना,
मैं सदियों से संग में तुम्हारे खड़ी हूँ !


बुधवार, 22 मई 2024

बीते बरबस, बरस संग के

तन का जब सौंदर्य रहे ना,
ना ही मन का यौक्न !
मूक, चहकती चंचल चिड़िया 
ताके सूखा उपवन ।
हृदय तुम्हारा तब भी होगा
क्या आतुर मिलने को ?
बीते बरबस, बरस संग के
रह गए दिवस गिनने को !

ना जाने क्यूँ बात - बात पर
भर आती हैं आँखें,
यादों के पंछी इस आँगन
गिरा गए फिर पांखें !
उतरेंगे वे बाग तुम्हारे
कल दाने चुगने को ।
बीते बरबस, बरस संग के
रह गए दिवस गिनने को !

कहीं दूर पर दीप नेह का 
टिमटिम कर जलता है,
प्रेम, परीक्षा देने से कब
घबराता, टलता है ?
थके हुए कदमों से भी
तत्पर हूँ मैं चलने को ,
बीते बरबस, बरस संग के
रह गए दिवस गिनने को !

जब मौसम मधुऋतु लेकर
लौटेगा, पुनः मिलेंगे !
हाथ तुम्हारा थामे, तब
जीवनभर संग चलेंगे।
अब जितना भी निभा सके,
उतने में खुश हो लेना,
रूठ ना जाना, छुपकर हमसे
तुम प्रतिशोध ना लेना। 
वृक्ष गिराता पत्र पुराने
नव पल्लव उगने को !
बीते बरबस, बरस संग के
रह गए दिवस गिनने को !


सोमवार, 1 अप्रैल 2024

फिर सुबह के गीत लिख दो साथियो !

फिर सुबह के गीत लिख दो साथियो !

नफरतों में प्रीत लिख दो साथियो !


तुम लहू के रंग को पहचान लो,

तुम हवाओं की दिशा को जान लो,

कर ना पाए अब तुम्हें गुमराह कोई,

ना बदल पाए तुम्हारी चाह कोई ,

इक अनोखी रीत लिख दो साथियो !

नफरतों में प्रीत लिख दो साथियो !


जात भी है, धर्म भी है, पंथ भी !

हर तरह के देश में हैं ग्रंथ भी,

क्यूँ मगर इनके लिए लड़ते हैं हम,

बात पर अपनी ही क्यूँ अड़ते हैं हम ?

तुम लिखो एक प्रेम की पुस्तक नई,

इंसान की तुम जीत लिख दो साथियो !

नफरतों में प्रीत लिख दो साथियो !


फिर सुबह के गीत लिख दो साथियो !

नफरतों में प्रीत लिख दो साथियो !





शुक्रवार, 29 मार्च 2024

बाबासाहब आंबेडकर

कितने बाबा यहाँ हो गए,
बाबासाहेब जैसा कौन ?
जो जल को चवदार बना दे
जादूगर था ऐसा कौन ?

ना पैसा, ना दौलत - शोहरत
ना कोई रखवाला था,
अपने दम पर गगन झुकाने
वाला वो मतवाला था।
शोषण और दमन से लड़ने
का उसने आहवान किया,
सदियों से अन्याय सह रहे
लोगों को नेतृत्व दिया।
पद की खातिर सब मिटते हैं,
जन की खातिर मिटता कौन ?
जो जल को चवदार बना दे
जादूगर था ऐसा कौन ?

संविधान का रूप सुनहरा
जिसके हाथों ने लिक्खा
ज्ञान औषधि, ज्ञान दुआ और
ज्ञान ही थी उसकी पूजा
बिगुल ज्ञान का बजा बजाकर
सोए लोग जगाता था
मरी हुई आत्माओं को वह
जिंदा यहाँ बनाता था।
जो पढ़ लेगा वही बचेगा 
ऐसा हमसे कहता कौन !
जो जल को चवदार बना दे
जादूगर था ऐसा कौन ?

बत्तीस डिग्री, नौ भाषाएँ
ये थे उसके आभूषण,
और हजारों ग्रंथों का
संग्रह ही था बस उसका धन !
भेदभाव और छुआछूत से
तड़प रहा था उसका मन,
ईश्वर ने तो एक बनाया
फिर क्यों अपमानित कुछ जन !
समता के सिद्धांतो को
दुनिया के आगे रखता कौन ?
जो जल को चवदार बना दे
जादूगर था ऐसा कौन ?

संदर्भ : (विकिपीडिया)
महाड़ का सत्याग्रह (अन्य नाम: चवदार तालाब सत्याग्रह व महाड का मुक्तिसंग्रामभीमराव आंबेडकर की अगुवाई में 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले के महाड स्थान पर दलितों को सार्वजनिक चवदार तालाब से पानी पीने और इस्तेमाल करने का अधिकार दिलाने के लिए किया गया एक प्रभावी सत्याग्रह था। इस दिन को भारत में सामाजिक सशक्तिकरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस सत्याग्रह में हजारों की संख्या में दलित लोग सम्मिलित हुए थे, सभी लोग महाड के चवदार तालाब पहुँचे और आंबेडकर ने प्रथम अपने दोनों हाथों से उस तालाब पानी पिया, फिर हजारों सत्याग्रहियों ने उनका अनुकरण किया। यह आंबेडकर का पहला सत्याग्रह था।

वैसे 'चवदार ' मराठी शब्द है जिसका अर्थ हिंदी में 'स्वादिष्ट' होता है।