जब भी मैंने कभी, दिल उसका दुखाया होगा
चोट का इक निशां, मेरी रूह पे आया होगा !
चोट का इक निशां, मेरी रूह पे आया होगा !
जानकर कौन भला, मोल इसे लेता है
ये मुहब्बत का मर्ज़ खुद चला आया होगा !
मेरे दिल पर लगे, ज़ख्मों को अगर गिन पाओ
करो हिसाब कि, कितनों ने दुखाया होगा !
अपनी आँखों के आँसुओं को, छिपाने खातिर
एक लतीफ़ा तेरी, महफ़िल में सुनाया होगा !
मैंने इक हाथ से ये गीत लिखे उसके लिए
पर दुआ में तो, दोनों को उठाया होगा !
ख़ुदा गवाह, इबादत के कुछ लम्हों के सिवा,
एक पल के लिए , तुझको ना भुलाया होगा !
किसी जनम का कहीं होगा बकाया कुछ तो,
बेसबब तो नहीं कुदरत ने मिलाया होगा !
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