Thursday, November 26, 2020

स्वर्ण-से क्षण

स्वर्ण संध्या, स्वर्ण दिनकर

सब दिशाएँ सुनहरी !

बिछ गई सारी धरा पर

एक चादर सुनहरी !

आसमाँ पर बादलों में

इक सुनहरा गाँव है,

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


सोनपरियों-सी सुनहरी,

सूर्यमुखियों की छटा ।

पीत वस्त्रों में लिपटकर

सोनचंपा महकता। 

सुरभि से उन्मत्त होकर

नाचती पागल पवन !

पीत पत्तों का धरा पर

स्वर्णमय बिछाव है ।

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


सुनहरे आकाश से अब

स्वर्ण किरणें हैं उतरतीं ।

सुनहरी बालू पे जैसे

स्वर्ण लहरें नृत्य करतीं ।

पिघलता सोना बहे औ'

स्वर्ण - घट रीता रहे !

प्रकृति का या नियति का

यह अजब अभाव है।

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


हैं हृदय के कोष में,

संचित सभी यादें सुनहली ।

और अँखियों में बसी है

रात पूनम की, रुपहली।

तुम मेरे गीतों को, जलने दो 

विरह की अग्नि में !

आग में तपकर निखरना

स्वर्ण का स्वभाव है। 

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।

----- ©मीना शर्मा


Wednesday, November 25, 2020

एक मुद्दत बाद....

एक मुद्दत बाद खुद के साथ आ बैठे

यूँ लगा जैसे कि रब के साथ आ बैठे !


कौन कहता है कि, तन्हाई रुलाती है,

हम खयालों में, उन्हीं के साथ जा बैठे।


वक्त, इतना वक्त, देता है कभी - कभी

इक ग़ज़ल भूली हुई हम गुनगुना बैठे।


लौटकर हम अपनी दुनिया में, बड़े खुश हैं

काँच के टुकड़ों से, गुलदस्ता बना बैठे ।


कोई कर लेता है कैसे, उफ्फ ! सौदा दोस्ती का

हम हलफ़नामे में, अपनी जाँ लिखा बैठे ।


एक अरसे बाद खोला, उस किताब को

फड़फड़ाते सफ़हे हमको, मुँह चिढ़ा बैठे। 


छाँव में  जिनकी पले, खेले, बढ़े,

उन दरख्तों पे क्यूँ तुम, आरी चला बैठे। 




Wednesday, October 28, 2020

कितना और मुझे चलना है ?

जीवन की लंबी राहों में

पीछे छूटे सहचर कितने !

कितनी यात्रा बाकी है अब ?

कितना और मुझे चलना है ?


कितना और अभी बाकी है, 

इन श्वासों का ऋण आत्मा पर !

किन कर्मों का लेखा - जोखा,

देना है विधना को लिखकर !

अभी और कितने सपनों को,

मेरे नयनों में पलना है ?

कितना और मुझे चलना है ?


अस्ताचल को चला भास्कर

और एक दिन गया गुजर !

कितने और पड़ाव रह गए ?

सहज प्रश्न यह, अचरज क्योंकर ?

बाकी कितने अनजानों से,

मुझको और यहाँ मिलना है ?

कितना और मुझे चलना है  ?


यूँ तो, इतनी आसानी से

मेरे कदम नहीं थकते हैं,

लेकिन जब संध्या की बेला

पीपल तले दिए जलते हैं !

मेरे हृदय - दीप  की, कंपित

लौ पूछे, कितना जलना है ?

कितना और मुझे चलना है ?