Saturday, March 13, 2021

मुस्कुराए भर थे हम तो...


मुस्कुराए भर थे हम तो
देखकर उनकी तरफ,
बात थी छोटी सी, मगर
बन गई कहानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो....

उम्र तो बस उम्र थी,
बीतती चली गई।
बचपना अब भी वही,
अब भी वही नादानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो.....

ग़र्द उस शीशे पे जाने
कब से है जमी हुई,
है नहीं आसां मिटाना
वक्त की निशानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो.....

बादलों से फिर झरेंगे
गीत मेरे इश्क के,
सूखते दरिया में होंगी
फिर वही रवानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो.....

हर बरस बरसेगा सावन
ये बरस लौटेगा कब ?
लौटकर आती नहीं
गुजरी हुई जवानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो......

Wednesday, February 3, 2021

फिर तुम्हारी राहों में !

तड़पेगी याद मेरी, फिर अधूरी चाहों में !
भटकेंगे प्राण मेरे, फिर तुम्हारी राहों में !!

छूकर वह पारिजात, कलियाँ कुछ सद्यजात।
बंद कर पलकें, करोगे, याद कोई मेरी बात।

सिमटेंगे गीत मेरे, फिर तुम्हारी बाँहों में !
भटकेंगे प्राण मेरे, फिर तुम्हारी राहों में !!

सावन की हो फुहार, या बसंत की बयार । 
मन विजन का मौन तोड़, बाजेगा फिर सितार ।

स्वर मद्धम बिखरेंगे, फिर सभी दिशाओं में !
भटकेंगे प्राण मेरे, फिर तुम्हारी राहों में !!

आसपास, फिर उदास, सुन पड़ेगी इक पुकार ।
फिर तुम्हारे नयनों से, बह चलेगी अश्रूधार ।

जल उठेंगे फिर चिराग, इश्क की दरगाहों में !
भटकेंगे प्राण मेरे, फिर तुम्हारी राहों में !!

Thursday, November 26, 2020

स्वर्ण-से क्षण

स्वर्ण संध्या, स्वर्ण दिनकर

सब दिशाएँ सुनहरी !

बिछ गई सारी धरा पर

एक चादर सुनहरी !

आसमाँ पर बादलों में

इक सुनहरा गाँव है,

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


सोनपरियों-सी सुनहरी,

सूर्यमुखियों की छटा ।

पीत वस्त्रों में लिपटकर

सोनचंपा महकता। 

सुरभि से उन्मत्त होकर

नाचती पागल पवन !

पीत पत्तों का धरा पर

स्वर्णमय बिछाव है ।

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


सुनहरे आकाश से अब

स्वर्ण किरणें हैं उतरतीं ।

सुनहरी बालू पे जैसे

स्वर्ण लहरें नृत्य करतीं ।

पिघलता सोना बहे औ'

स्वर्ण - घट रीता रहे !

प्रकृति का या नियति का

यह अजब अभाव है।

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


हैं हृदय के कोष में,

संचित सभी यादें सुनहली ।

और अँखियों में बसी है

रात पूनम की, रुपहली।

तुम मेरे गीतों को, जलने दो 

विरह की अग्नि में !

आग में तपकर निखरना

स्वर्ण का स्वभाव है। 

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।

----- ©मीना शर्मा