रविवार, 11 जुलाई 2021

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !

 मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !

भागेगा बाहर तो होगा दुःखी !

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !


ये माया के मेले, झंझट झमेले

यूँ ही चलेंगे रे ! चलते रहेंगे ।

कितना तू रोकेगा, तेरे ही अपने

तुझको छलेंगे रे ! छलते रहेंगे । 

ना सुधरेगा कोई, ना बदलेगा कोई,

जग से लड़ाई बहुत हो चुकी। 

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !


नदिया के जैसे, तू तृष्णा को हर ले

बादल के जैसे, अहं रिक्त कर ले !

फूलों के जैसे, तू महका दे परिसर

वृक्षों के जैसे, स्थितप्रज्ञ बन ले !

तू अब मौन हो जा, मनन में तू खो जा,

प्रभु से लगा के लौ, हो जा सुखी !

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !!!


सृजक ने बनाए, घरौंदे सजाए

ये यूँ ही उजड़ते औ' बसते रहेंगे ।

कभी काल के फंदे ढीले भी होंगे

कभी पाश अपना ये कसते रहेंगे ।

जग की ये गाड़ी, चलती रहेगी

ना ये रुकेगी, ना ये रुकी !

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !!!




सोमवार, 5 जुलाई 2021

ये चाँद बरफ के टुकड़े - सा

बेबस अहसासों की रुत है,

मौसम है भीगी आँखों का ।

बहके - बहके जज्बातों में

मन जाने कैसे सँभलता है।


अँखियों की सरहद से बाहर

क्या मोल है कोई सपनों का ?

जब तक आँखों में रहता है,

हर सपना अपना लगता है। 


दिल की हथकड़ियाँ खोल भी दो,

आजाद करो अल्फ़ाज़ों को ।

दम घुटता है अरमानों का

औ' उम्र का सूरज ढलता है। 


ना सुर्ख गुलाबों के तोहफे

ना ही महके - महके रुक्के,

ना कसमें,ना वादे,ना शिकवे गिले

वो इश्क इसी को कहता है।


जब फूल मुहब्बत के फूलें,

महसूस हो खुशबू रूहानी ।

तब इत्र में डूबे गीतों का

उपहार किसी को मिलता है।


वादों के अबोले बोलों का,

अनलिखे - अधूरे नग्मों का,

इस दिल की तिजोरी में मेरी,

यादों का खजाना रहता है। 


कुछ जागी - जागी रातों में,

कुछ ठहरे - ठहरे लम्हों में,

ये चाँद बर्फ के टुकड़े सा,

पलकों में मेरी पिघलता है। 




गुरुवार, 10 जून 2021

तारे हैं दूर आसमां में

तारे हैं दूर आसमां में 

और जमीं पे हम,

बस, इक सितारा छूने का 

अरमां लिए हुए।


सबको कहाँ मिलते हैं घर, 

वादी में गुलों की।

काँटों के घरौंदों में भी, 

रहना तो सीखिए।


अच्छा किया, तुमने मेरी 

वफा पे शक किया,

कुछ और सबक सीखने थे, 

सीख ही लिए।


इस मोड़ से ऐ जिंदगी,

चल राह बदल लें,

मिलने के जो मकसद थे,

सभी हमने जी लिए ।


उठ्ठी लहर सागर से, 

किनारे पे मर मिटी।

गहराइयों के राज 

किनारों ने पढ़ लिए।


क्यूँ इस तरहा से कैद में, 

कटती है जिंदगी,

हैं दर भी, दरीचे भी,

जरा खोल लीजिए। 


है उम्र के नाटक का, 

अभी अंक आखिरी।

ना भूल सकें लोग, 

इस तरहा से खेलिए।