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सोमवार, 10 मार्च 2025

जहरी मीडिया

आग लगने की तके है 
राह जहरी मीडिया
घी लिए तैयार बैठा, 
वाह जहरी मीडिया !

धर्म, जाति, कौम के 
रंग में रंगे हर रूह को
विषबुझे तीरों से करता
वार जहरी मीडिया !

चैनलों के कटघरे में 
हैं खड़े राम औ रहीम
कभी वकील है, कभी 
गवाह जहरी मीडिया !

हल निकल सकता जहाँ 
खामोशियों से खुद-ब-खुद
चीखता है बेवजह, 
बेपनाह जहरी मीडिया !

बस दूध के उबाल सा 
उफने है चंद रोज,
पकड़े है फिर अगली खबर 
की राह जहरी मीडिया !

जनता छली जाती रही , 
सच की तलाश में
देता रहा बस मुफ्त की 
सलाह जहरी मीडिया !



रविवार, 11 जुलाई 2021

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !

 मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !

भागेगा बाहर तो होगा दुःखी !

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !


ये माया के मेले, झंझट झमेले

यूँ ही चलेंगे रे ! चलते रहेंगे ।

कितना तू रोकेगा, तेरे ही अपने

तुझको छलेंगे रे ! छलते रहेंगे । 

ना सुधरेगा कोई, ना बदलेगा कोई,

जग से लड़ाई बहुत हो चुकी। 

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !


नदिया के जैसे, तू तृष्णा को हर ले

बादल के जैसे, अहं रिक्त कर ले !

फूलों के जैसे, तू महका दे परिसर

वृक्षों के जैसे, स्थितप्रज्ञ बन ले !

तू अब मौन हो जा, मनन में तू खो जा,

प्रभु से लगा के लौ, हो जा सुखी !

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !!!


सृजक ने बनाए, घरौंदे सजाए

ये यूँ ही उजड़ते औ' बसते रहेंगे ।

कभी काल के फंदे ढीले भी होंगे

कभी पाश अपना ये कसते रहेंगे ।

जग की ये गाड़ी, चलती रहेगी

ना ये रुकेगी, ना ये रुकी !

मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !!!




सोमवार, 28 सितंबर 2020

कब तक चलना है एकाकी ?

जीवन की दुस्तर राहों पर,

कब तक चलना है एकाकी ?

ठोकर खाकर गिर जाना है

और सँभलना है एकाकी !!!


मैंने सबकी राहों से,

हरदम बीना है काँटों को ।

मेरे पाँव हुए जब घायल

पीड़ा सहना है एकाकी !!!


इन हाथों ने आगे बढ़कर,

सबकी आँखें पोंछी हैं ।

अपनी आँखें जब भर आईं,

मुझको रोना है एकाकी !!!


सीमाओं को पार न करना,

मर्यादाओं में रहना ।

इसका दंड मिला है पल-पल,

जिसे भोगना है एकाकी !!!


विष के वृक्ष को काट ना पाई,

छाया की उम्मीद रही।

जहर भरे फल झोली गिरते

जिनको चखना है एकाकी !!!


स्वप्न, उम्मीदें, यादें, वादे

बाकी हैं, पर धुँधले - धुँधले।

धुंध भरी राहें, मंजिल तक

मुझे पहुँचना है एकाकी !!!





मंगलवार, 1 सितंबर 2020

मन भूलभुलैया !

 मन भूलभुलैया !!!

भटकती हैं भावनाएँ

कल्पनाएँ बावरी सी

छ्टपटा रहे विचार

कौन राह निकलें ?

एक राह दूसरी से, तीसरी से,

चौथी से, पाँचवीं से.....

गुत्थमगुत्था पड़ी हैं 

और सभी राहें

गुजरती हैं उसी मन से

भूलभुलैया है जो

मन भूलभुलैया !!!


मन भूलभुलैया !!!

बादलों में बादल

लताओं में लताएँ

शाखों में शाखाएँ

पहाड़ों से गिरती हुई

दुग्ध धवल धाराएँ

उलझे उलझे हैं सब

इतना उलझे हैं कि

अलग हुए तो जैसे

टूट टूट जाएँगे 

चित्र सभी कुदरत के !!!

मन भूलभुलैया !!!


मन भूलभुलैया !!!

बेवजह ही फुदकती है

चिड़िया यहाँ वहाँ

झटक भीगे पंखों को

गर्दन को मोड़कर

टेढ़ा कर चोंच को

हेय दृष्टि का कटाक्ष

फेंकती है,

व्यस्त त्रस्त दुनिया के

लोगों पर !!!

उड़ जाती है फुर्र से ।

ठगी सी खड़ी - खड़ी

सोचती मैं रह जाती

मन भूलभुलैया !!!



रविवार, 16 अगस्त 2020

छद्म भावों से घिरे !

 कितने दिखावों से घिरे, 

कितने छलावों से घिरे !

क्यूँ जी रहे हो जिंदगी,

यूँ छद्म भावों से घिरे !


ना प्रेम ही करते बना

ना ज्ञान ही पाया घना

ना मीत ही कोई बना

ना जीत ने तुमको चुना ।

चलते रहे कदम-कदम

कितने अभावों से घिरे !

क्यूँ जी रहे हो जिंदगी

यूँ छद्म भावों से घिरे !


जाने ये जन्म क्यों मिला

तुम जान ही पाए नहीं,

पाकर मनुज शरीर को

मानव भी बन पाए नहीं !

जो फल नहीं पाईं कभी

ऐसी दुआओं से घिरे !

क्यूँ जी रहे हो जिंदगी

यूँ छद्म भावों से घिरे !


बस मौन हो सहते रहे

हर जुल्म को, अन्याय को

तुम बाँच भी पाए कहाँ

आयु के हर अध्याय को ।

जीवन के रंगमंच पर 

झूठी अदाओं से घिरे !

क्यूँ जी रहे हो जिंदगी

यूँ छद्म भावों से घिरे !



बुधवार, 13 मई 2020

मंजिल नहीं यह बावरे !

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह बावरे !!!

पाँव डगमग हो रहे औ'
नयन छ्लछ्ल हो रहे,
मीत बनकर जॊ मिले थे
वह भरोसा खो रहे।
प्रेम की बूँदों का प्यासा
बन ना चातक बावरे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!

पथ अंधेरा गर मिले तो
आस के दीपक जला ले,
राह में काँटें अगर हों
पाँव को अपने बचा ले !
तू अकेला ही प्रवासी
कोई न तेरे साथ रे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!

याद आएँ जो तुझे, कूचे
कभी इस शहर के
आँसुओं को मत बहाना
घूँट पीना जहर के ।
वेदना मत भूलना यह
भरने ना देना घाव रे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!




बुधवार, 8 अप्रैल 2020

क्या वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं ?

धर्म से रिश्ता सब कुछ है,क्या वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं?
ओ भाई मेरे,ओ बंधु मेरे,क्या अमन से रिश्ता कुछ भी नहीं?

जिस माटी में तुम जन्मे, खेले-खाए और पले - बढ़े
उस माटी से गद्दारी क्यों, ये कैसी जिद पर आज अड़े ?
क्या अक्ल गई मारी तेरी, किसके बहकावे में बिगड़े,
जी पाओगे अपने दम पर, क्या आपस में करके झगड़े?
क्यूँ समझाना बेकार हुआ, क्यूँ शत्रु हुए मानवता के?
क्यूँ वतनपरस्ती भूल गए, क्या यही सिखाया मजहब ने?

शाख से ही रिश्ता है क्या, इस चमन से रिश्ता कुछ भी नहीं?
धर्म से रिश्ता सब कुछ है और वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं?

क्यों छेद कर रहे उसमें ही, जिस थाली में तुम खाते हो?
जो हाथ तुम्हारे रक्षक हैं, उनको ही तोड़ने जाते हो ?
हम एक रहें और नेक रहें, क्या यह मानव का फर्ज़ नहीं?
यह धरती तेरी भी माँ है, माँ का तुझ पर कोई कर्ज नहीं?
नफरत से नफरत बढ़ती है, क्यों आग लगाने को निकले?
इक सड़ी सोच को लेकर क्यों, ईमान मिटाने को निकले?

क्या तेरी नजर में भाई मेरे, इंसान से रिश्ता कुछ भी नहीं?
धर्म से रिश्ता सब कुछ है और वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं?



शनिवार, 27 जुलाई 2019

यथार्थ

मैंने अपने खून के कुछ 
कतरे बोए थे,
उनको सींचा था मैंने 
अपनी साँसों से
अपने ख्वाबों को कूट-काटकर
खाद बनाकर डाली मैंने !!!

उन कतरों को धीमे-धीमे 
बढ़ता देखा,
नन्हें-नन्हें हाथ पाँव 
उनमें उग आए,
मुस्कानों की, किलकारी की
फूट रहीं थीं शाखाएँ जब
तब मैंने इक बाड़ बनाई
नन्हा पौधा पनप रहा था !!!

सारे हक, सारी खुशियाँ, 
सारे शौकों को किया इकट्ठा, 
बाड़ बनाई,
हर आँधी में, हर तूफां में
दिया सहारा !!!

धीरे धीरे पौधा बढ़कर 
वृक्ष हो गया,
अब मेरे समकक्ष हो गया,
उसके अपने हमजोली हैं
उसका है अपना आकाश,
मिट्टी भी उसकी अपनी है,
आँधी तूफां में डटकर अब
कर सकता है स्वयं सामना,
नहीं बाड़ की रही जरूरत !!!

इक दिन कड़ी धूप में मैंने
उसकी छाया जब माँगी तो
उसने उसकी कीमत चाही
मेरी कमियाँ मुझे गिनाईं !
मेरे पैरों के नीचे की,
धरती भी अब तो उसकी थी !!!

मंगलवार, 7 मई 2019

हम आशाओं पर जीते हैं !

घनघोर निराशा के युग में
हम आशाओं पर जीते हैं,
रखते हैं चाह अमरता की
और घूँट गरल के पीते हैं।

सीते हैं झूठे वादों से,
हम यथार्थ की फाटी झोली।
कागा के कर्कश स्वर को,
समझ रहे कोयल की बोली ।
विद्वानों को उपहास प्राप्त,
मूरख पा जाता है वंदन।
ईश्वर भी असमंजस में हैं,
किसका मंदिर,किसका चंदन ?
सबको अपनी पड़ी यहाँ
करूणा के घट सब रीते हैं।।

घनघोर निराशा के युग में
हम आशाओं पर जीते हैं।।

छ्ल कपट, प्रेम का भेष धरे
मैत्री का जाल बिछाता है।
कंचन पात्रों में जहर भरे,
अमृत का स्वांग रचाता है।
जीवन के चौराहों पर अब,
सारी राहें भरमाती हैं।
दुनियादारी के दाँव पेच,
दुनिया ही यहाँ सिखाती है ।
जीने की कठिन लड़ाई में,
दीनों के सब दिन बीते हैं।

घनघोर निराशा के युग में
हम आशाओं पर जीते हैं।

यह कामवासना का कलियुग,
यह स्वार्थसाधना का कलियुग,
यह अर्थकामना का कलियुग,
यह छद्म धारणा का कलियुग !
संस्कारपतन का युग है यह,
अन्याय, दमन का युग है यह,
कैसी प्रगति, कैसा विकास,
बस शस्त्र सृजन का युग है यह !
सब संसाधन धनवानों के
निर्धन को नहीं सुभीते हैं।

घनघोर निराशा के युग में
हम आशाओं पर जीते हैं !!!













बुधवार, 24 अप्रैल 2019

वेदना से प्रेम तक

एक पल का,
हाँ, सिर्फ एक पल का
समय लगता है,
भावना का रुपांतरण
वेदना में होने के लिए !
और वही पल साक्षी होता है
मनुष्य में ईश्वर के अंश का।

वेदना के अभाव में
ईश्वर के दूत भटकते हैं धरती पर,
खोजते हैं अश्रुओं के मोती
जो नयनों की सीपियों में पलते
और सिर्फ इसी लोक में मिलते हैं।

ब बदल जाती है
वेदना संवेदना में
तब स्वर्ग से होती है पुष्पवर्षा
झाँकते हैं देवगण
मनुष्यों के हृदय से !

संवेदना के तुषार बिंदुओं में
भीगने आती हैं अप्सराएँ !
ठीक उस क्षण, जिस क्षण
संवेदना हो जाती  है प्रेम
उसी क्षण हो जाती है
यह धरती स्वर्गसम !!!

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

मानव, तुम्हारा धर्म क्या है ?

धर्म चिड़िया का,
खुशी के गीत गाना  !
धर्म नदिया का,
तृषा सबकी बुझाना ।
धर्म दीपक का,
हवाओं से ना डरना !
धर्म चंदा का,
सभी का ताप हरना ।।

किंतु हे मानव !
तुम्हारा धर्म क्या है ?

धर्म तारों का,
तिमिर में जगमगाना !
धर्म बाती का,
स्वयं जल,तम मिटाना ।
धर्म वृक्षों का,
जुड़े रहना मृदा से !
धर्म फूलों का,
सुरभि अपनी लुटाना ।।

किंतु हे मानव !
तुम्हारा धर्म क्या है ?

धर्म चींटी का,
बताना मर्म श्रम का !
धर्म सूरज का,
अधिक ना तप्त होना ।
धर्म सागर का,
रहे सीमा में अपनी !
धर्म मेघों का,
बरसकर रिक्त होना ।।

किंतु हे मानव !
तुम्हारा धर्म क्या है ?

धर्म पर्वत का,
अचल रहना हमेशा !
धर्म ऋतुओं का,
धरा को रंग देना ।
धर्म धरती का,
उठाना भार सबका !
धर्म नभ का है,
विहग को पंख देना ।।

किंतु हे मानव !
तुम्हारा धर्म क्या है ?
 --- मीना शर्मा ---

गुरुवार, 28 मार्च 2019

तू गा रे ! साँझ सकारे !!!

ओ मांझी ! तेरे गीत बड़े प्यारे !
तू गा रे ! साँझ सकारे !!!
लहरों के मीत,गीतों में प्रीत,
तू गा रे ! साँझ सकारे !!!

मांझी, तू नदिया का साथी,
तू जाने वो क्या कहती !
कब इठलाती, कब मुस्काती,
कब उसकी आँखें भरती ।
नदिया गाकर किसे बुलाए,
हमें भी बता रे !
तू गा रे ! साँझ सकारे !!!

धारा के कलकल स्वर में,
सुर मिल जाएगा तेरा,
गीत विरह के मत गाना
उस पार पिया का डेरा !
साँझ ढले से पहले मांझी,
पार पहुँचना रे !
तू गा रे ! साँझ सकारे !!!

बीच बीच में भँवर पड़े हैं,
जलधारा है गहरी !
अब पतवार थाम ले कसकर,
ओ प्राणों के प्रहरी !
धारा के संग धारा होकर,
कहाँ तू चला रे !
तू गा रे ! साँझ सकारे !!!

लहरों के मीत,गीतों में प्रीत,
तू गा रे ! साँझ सकारे !!!
तू गा रे ! साँझ सकारे !!!


शनिवार, 19 जनवरी 2019

दूर के ढोल सुहाने

दूर के ढोल सुहाने
लगते हैं
पास आने पर डराने
लगते हैं।

जिद ना करना
सितारों को कभी छूने की ।
आसमां के फूल
हाथ नहीं महकाते
उनको सहलाओ तो वे
हाथ जलाने लगते हैं।

वक्त गर साथ दे,
चूहा भी शेर होता है।
गुरुघंटाल भी गुरुओं को
सिखाने लगते हैं।
खिले फूल लगते हैं
सब को प्यारे,
फेंक दिए जाते हैं वे, जब
मुरझाने लगते हैं।

इक नया रूप निकलता है
यहाँ पर्त-दर-पर्त !
हर एक चेहरे को मुखौटे
लगाने पड़ते हैं।
महल विश्वास का
ढह जाता है पल दो पल में
जिसकी बुनियाद ही रखने में
जमाने लगते हैं।

खाली घड़े इतराने लगते हैं
आधा भरते ही,
छलकने छलछलाने लगते हैं !

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

मुस्कान में बदलो !!!

किसी की आँख के आँसू को 
तुम मुस्कान में बदलो !
दर्द को गीत में बदलो,
व्यथा को तान में बदलो !
जमाना साथ ना रोएगा
गर रोते रहोगे तुम !
रूदन बदलो हँसी में
वेदना को गान में बदलो !!!
किसी की आँख के.......

किसी का प्यार ना पाओ तो
खुद ही प्यार बन जाओ !
लगा लेंगे गले ईश्वर,
सुमन का हार बन जाओ !
तुम्हारे कर्म से तुमको
ये दुनिया याद रखेगी,
कि तुम हर काम को अपने
किसी अंजाम में बदलो !!!
किसी की आँख के.......

नहीं मिलता कोई माली
यहाँ जंगल के फूलों को !
नहीं करता क्षमा यह जग
कभी दूजे की भूलों को !
मगर नन्हा सा दीपक भी
अँधेरों से तो लड़ता है,
जगत के क्रूर भावों को,
दया के दान में बदलो !!!
किसी की आँख के.....

मिलेंगे और भी कारण
अगर लड़ना है, मरना है !
खुदा और ईश को, फिर क्यों
तुम्हें बदनाम करना है ?
मनुजता का पढ़ाते पाठ,
हों कुरआन या गीता !
हर इक हिंदू औ' मुस्लिम को
सिर्फ इंसान में बदलो !!!
किसी की आँख के.....

किसी की आँख के आँसू को तुम
मुस्कान में बदलो !
दर्द को गीत में बदलो,
व्यथा को तान में बदलो !!!



बुधवार, 25 अप्रैल 2018

तब मन तो, दुखता है ना ?

काँटों से हरपल चुभन मिली,
मिलनी ही थी !
पर फूल चुभें जब काँटे बन,
आँचल को तार-तार कर दें !
जब कलियों से भी जख्म मिलें,
पंखुड़ियों से तन छिल जाए !
तब मन तो, दुखता है ना ?

सूरज से आग बरसती है,
बरसेगी ही !
पर चंदा की शीतल किरणें,
जब बन अंगारे, झुलसा दें !
अंजुरि में भरी चाँदनी से,
हाथों में छाले पड़ जाएँ !
तब मन तो, दुखता है ना ?

अँधियारे मग में पग भटके,
भटकेगा ही !
पर भरी दोपहरी राह भूल,
जब पागल सा भटके पांथी !
जब दीपक तले अंधेरा पा,
कुछ कर ना सके जलती बाती !
तब मन तो, दुखता है ना ?

जो प्रीत का धागा कच्चा हो,
टूटेगा ही !
पर उस धागे का एक छोर
जब बँधा हृदय से रह जाए !
और दूजा छोर खोजने में,
हर साँस उलझ कर रह जाए !
तब मन तो, दुखता है ना ?