घी लिए तैयार बैठा,
धर्म, जाति, कौम के
विषबुझे तीरों से करता
चैनलों के कटघरे में
कभी वकील है, कभी
हल निकल सकता जहाँ
बस दूध के उबाल सा
पकड़े है फिर अगली खबर
जनता छली जाती रही ,
देता रहा बस मुफ्त की
मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !
भागेगा बाहर तो होगा दुःखी !
मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !
ये माया के मेले, झंझट झमेले
यूँ ही चलेंगे रे ! चलते रहेंगे ।
कितना तू रोकेगा, तेरे ही अपने
तुझको छलेंगे रे ! छलते रहेंगे ।
ना सुधरेगा कोई, ना बदलेगा कोई,
जग से लड़ाई बहुत हो चुकी।
मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !
नदिया के जैसे, तू तृष्णा को हर ले
बादल के जैसे, अहं रिक्त कर ले !
फूलों के जैसे, तू महका दे परिसर
वृक्षों के जैसे, स्थितप्रज्ञ बन ले !
तू अब मौन हो जा, मनन में तू खो जा,
प्रभु से लगा के लौ, हो जा सुखी !
मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !!!
सृजक ने बनाए, घरौंदे सजाए
ये यूँ ही उजड़ते औ' बसते रहेंगे ।
कभी काल के फंदे ढीले भी होंगे
कभी पाश अपना ये कसते रहेंगे ।
जग की ये गाड़ी, चलती रहेगी
ना ये रुकेगी, ना ये रुकी !
मन तू, हो जा रे, अंतर्मुखी !!!
जीवन की दुस्तर राहों पर,
कब तक चलना है एकाकी ?
ठोकर खाकर गिर जाना है
और सँभलना है एकाकी !!!
मैंने सबकी राहों से,
हरदम बीना है काँटों को ।
मेरे पाँव हुए जब घायल
पीड़ा सहना है एकाकी !!!
इन हाथों ने आगे बढ़कर,
सबकी आँखें पोंछी हैं ।
अपनी आँखें जब भर आईं,
मुझको रोना है एकाकी !!!
सीमाओं को पार न करना,
मर्यादाओं में रहना ।
इसका दंड मिला है पल-पल,
जिसे भोगना है एकाकी !!!
विष के वृक्ष को काट ना पाई,
छाया की उम्मीद रही।
जहर भरे फल झोली गिरते
जिनको चखना है एकाकी !!!
स्वप्न, उम्मीदें, यादें, वादे
बाकी हैं, पर धुँधले - धुँधले।
धुंध भरी राहें, मंजिल तक
मुझे पहुँचना है एकाकी !!!
मन भूलभुलैया !!!
भटकती हैं भावनाएँ
कल्पनाएँ बावरी सी
छ्टपटा रहे विचार
कौन राह निकलें ?
एक राह दूसरी से, तीसरी से,
चौथी से, पाँचवीं से.....
गुत्थमगुत्था पड़ी हैं
और सभी राहें
गुजरती हैं उसी मन से
भूलभुलैया है जो
मन भूलभुलैया !!!
मन भूलभुलैया !!!
बादलों में बादल
लताओं में लताएँ
शाखों में शाखाएँ
पहाड़ों से गिरती हुई
दुग्ध धवल धाराएँ
उलझे उलझे हैं सब
इतना उलझे हैं कि
अलग हुए तो जैसे
टूट टूट जाएँगे
चित्र सभी कुदरत के !!!
मन भूलभुलैया !!!
मन भूलभुलैया !!!
बेवजह ही फुदकती है
चिड़िया यहाँ वहाँ
झटक भीगे पंखों को
गर्दन को मोड़कर
टेढ़ा कर चोंच को
हेय दृष्टि का कटाक्ष
फेंकती है,
व्यस्त त्रस्त दुनिया के
लोगों पर !!!
उड़ जाती है फुर्र से ।
ठगी सी खड़ी - खड़ी
सोचती मैं रह जाती
मन भूलभुलैया !!!
कितने दिखावों से घिरे,
कितने छलावों से घिरे !
क्यूँ जी रहे हो जिंदगी,
यूँ छद्म भावों से घिरे !
ना प्रेम ही करते बना
ना ज्ञान ही पाया घना
ना मीत ही कोई बना
ना जीत ने तुमको चुना ।
चलते रहे कदम-कदम
कितने अभावों से घिरे !
क्यूँ जी रहे हो जिंदगी
यूँ छद्म भावों से घिरे !
जाने ये जन्म क्यों मिला
तुम जान ही पाए नहीं,
पाकर मनुज शरीर को
मानव भी बन पाए नहीं !
जो फल नहीं पाईं कभी
ऐसी दुआओं से घिरे !
क्यूँ जी रहे हो जिंदगी
यूँ छद्म भावों से घिरे !
बस मौन हो सहते रहे
हर जुल्म को, अन्याय को
तुम बाँच भी पाए कहाँ
आयु के हर अध्याय को ।
जीवन के रंगमंच पर
झूठी अदाओं से घिरे !
क्यूँ जी रहे हो जिंदगी
यूँ छद्म भावों से घिरे !