शनिवार, 22 दिसंबर 2018

मुस्कान में बदलो !!!

किसी की आँख के आँसू को 
तुम मुस्कान में बदलो !
दर्द को गीत में बदलो,
व्यथा को तान में बदलो !
जमाना साथ ना रोएगा
गर रोते रहोगे तुम !
रूदन बदलो हँसी में
वेदना को गान में बदलो !!!
किसी की आँख के.......

किसी का प्यार ना पाओ तो
खुद ही प्यार बन जाओ !
लगा लेंगे गले ईश्वर,
सुमन का हार बन जाओ !
तुम्हारे कर्म से तुमको
ये दुनिया याद रखेगी,
कि तुम हर काम को अपने
किसी अंजाम में बदलो !!!
किसी की आँख के.......

नहीं मिलता कोई माली
यहाँ जंगल के फूलों को !
नहीं करता क्षमा यह जग
कभी दूजे की भूलों को !
मगर नन्हा सा दीपक भी
अँधेरों से तो लड़ता है,
जगत के क्रूर भावों को,
दया के दान में बदलो !!!
किसी की आँख के.....

मिलेंगे और भी कारण
अगर लड़ना है, मरना है !
खुदा और ईश को, फिर क्यों
तुम्हें बदनाम करना है ?
मनुजता का पढ़ाते पाठ,
हों कुरआन या गीता !
हर इक हिंदू औ' मुस्लिम को
सिर्फ इंसान में बदलो !!!
किसी की आँख के.....

किसी की आँख के आँसू को तुम
मुस्कान में बदलो !
दर्द को गीत में बदलो,
व्यथा को तान में बदलो !!!



शनिवार, 15 दिसंबर 2018

शिशिर

भय से पीले पड़ गए,
तरुओं के सब पात।
काँटों सा तन में चुभे
शिशिर ऋतु का वात ।।

हुए दिगंबर वृक्ष ज्यों,
तापस त्यागे वस्त्र ।
हिमवृष्टि, ठंडी हवा,
शिशिर ऋतु के अस्त्र ।।

सूर्य ठिठुरता सा उगे,
चंदा करे विचार।
दीन दरिद्र कैसे सहें,
शिशिर ऋतु की मार ।।

मिलते श्रमिक-किसान को,
अल्पवस्त्र, अल्पान्न ।
उस पर तन को भेदता,
शिशिर ऋतु का बाण ।।

अन्न - धन की हो प्रचुरता,
प्रियतम का हो साथ ।
तब भलि लागे हर ऋतु
शिशिर, ग्रीष्म, बरसात ।

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

कुछ यूँ लगा जैसे....

छूकर मेरी पलकें मेरा सपना चला गया
कुछ यूँ लगा जैसे कोई अपना चला गया !

खाली पड़ा हुआ था, जो मुद्दत से बंद था
रहकर उसी मकान में मेहमां चला गया !

ले गया कोई हमें, हमसे ही लूटकर
इक अजनबी के संग दिल-ए-नादां चला गया !

आँखें तो कह रही थीं, रोक लो अगर चाहो
जाने के बाद फिर ये ना कहना - चला गया !

मंज़िल को ढ़ूँढ़ती रहीं कुछ गुमशुदा राहें
ना जाने कब, यहाँ से कारवां चला गया !

वो शौक, वो फ़ितूर, वो दीवानगी कहाँ ?
बारिश में भीगने का जमाना चला गया !

अब घोंसलों को तोड़कर बनते हैं घरौंदे
चिड़िया का इस शहर से आशियां चला गया !!!

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

काश ! ज़िंदगी कविता होती !

काश ! ज़िंदगी कविता होती !
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँटकर,
अपने हिस्से हम लिख लेते !!!

कभी-कभी ऐसा भी होता,
मेरी बातें तुम लिख देते
और तुम्हारी लिखती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !!!
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काश ! ज़िंदगी कविता होती !
लिखते-लिखते दिन हो जाता,
पढ़ते-पढ़ते रातें होतीं,
लफ्जों की ही धड़कन होती,
लफ्जों की ही साँसें होतीं।
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँटकर
अपने हिस्से हम जी लेते !!!

कभी- कभी ऐसा भी होता,
मेरी साँसें तुम जी लेते
और तुम्हारी जीती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !
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काश ! ज़िंदगी कविता होती !
तुकबंदी करते-करते हम,
इक-दूजे की 'तुक' हो जाते,
मैं हो जाती एक अंतरा
और दूसरा तुम हो जाते।
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँट कर
अपने हिस्से हम गा लेते !!!!

कभी-कभी ऐसा भी होता,
मेरा नगमा तुम गा देते
और तुम्हारा गाती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !!!
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काश ! ज़िंदगी कविता होती !!!

रविवार, 2 दिसंबर 2018

बंदिश लबों पे....

बंदिश लबों पे, लफ्जों पे पहरे बिठा दिए
अश्कों की हद में जख्म कुछ गहरे बिठा दिए।

है फासिला सदियों का हकीकत औ' ख्वाब में
अच्छा किया जो ख्वाब सुनहरे मिटा दिए।

सच ही कहा है वक्त को बेताज बादशाह
लोगों के वक्त ने असल चेहरे दिखा दिए।

एक ही गुलशन के गुल, किस्मत अलग-अलग
कुछ से सजे सेहरे, तो कुछ अर्थी सजा दिए।

बनकर नदीम लूटनेवालों का क्या करें
इंसानों को शतरंज के मोहरे बना दिए।

(नदीम - दोस्त/साथी)