शनिवार, 29 जून 2019

तुम समय संग आगे निकलते गए....

तुम समय संग आगे निकलते गए,
मैं जहाँ थी वहीं पर खड़ी रह गई....
इतने ऊँचे हुए, आसमां हो गए,
मैं धरा थी, धरा हूँ, धरा ही रही !!!

रिक्त होती रही श्वास की गागरी
अर्घ्य देती रही अंजुरी-अंजुरी
छटपटाती रही बद्ध पंछी सी, पर
पार कर ना सकी देह की देहरी 
दंड सारे नियत थे मेरे ही लिए
मैं क्षमा थी, क्षमा हूँ, क्षमा ही रही !!!

तुम तो पाषाण से देवता हो गए
पूजने का भी हक, मुझको मिल ना सका,
कौन दर्शन करे, कौन पूजन करे
ये भी दुनिया के लोगों ने निश्चित किया
राम ने स्पर्श से, जिंदा तो कर दिया
पर अहिल्या शिला थी, शिला ही रही !!!

तुम समय संग आगे निकलते गए,
मैं जहाँ थी वहीं पर खड़ी रह गई....
इतने ऊँचे हुए, आसमां हो गए,
मैं धरा थी, धरा हूँ, धरा ही रही !!!





रविवार, 16 जून 2019

एक हृदय पाने की कोशिश !

एक हृदय पाने की कोशिश !

इस कोशिश में शब्द छिन गए
चेहरे की मुस्कान छिन गई
अंतर के सब बोल छिन गए
यादों के सामान छिन गए !
पर हँसने गाने की कोशिश !
एक हृदय पाने की कोशिश !

इस दरिया की गहराई में
डूबे उतरे, पार नहीं था
रात गुज़रती तनहाई में
सपनों का उपहार नहीं था !
ज़िंदा रह पाने की कोशिश !
एक हृदय पाने की कोशिश !

एक हृदय जो कहीं और था
किसी और की थाती था वह
जीवनभर के संग साथ की
किसी प्रिया की पाती था वह !
कैसी दीवाने की कोशिश !
वही हृदय पाने की कोशिश !

किसी बात पर नहीं रीझना 
किसी बात पर नहीं खीझना
मुझको तुमसे नहीं जीतना 
पहली बारिश नहीं भीगना !
दूर चले जाने की कोशिश !
एक हृदय पाने की कोशिश !

धड़कन के इस करुण रुदन पर
घायल मन के मौन कथन पर
अट्टहास करते रहना तुम
इस भोले से अपनेपन पर !!!
इंद्रधनुष छूने की कोशिश !
एक हृदय पाने की कोशिश !!!



शनिवार, 1 जून 2019

नए ब्लॉग का श्रीगणेश

  • आज से अपनी सभी कविताओं को अपने पुराने ब्लॉग 'चिड़िया' से नए ब्लॉग 'प्रतिध्वनि' पर डाल रही हूँ। पिछले कई महीनों से मैं अपने ब्लॉग 'चिड़िया' के लिंक्स फेसबुक पर शेयर नहीं कर पा रही। समस्या क्या है, पता नहीं लग रहा। मैंने कई बार इसकी शिकायत भी दर्ज कराई पर कुछ नहीं हुआ। सिर्फ यह पता चला कि यदि कोई फेसबुक कम्यूनिटी आपकी किसी पोस्ट को अस्वीकृत कर देती है तो फेसबुक आपको आगे उससे संबंधित पोस्ट साझा करने की अनुमति नहीं देता। 
  • मैंने दिमाग पर जोर डाला तो याद आया कि 15 - 16 फरवरी के आसपास मैंने पहली बार iblogger पर अपनी एक कविता की लिंक साझा की थी जिसे अस्वीकार कर दिया गया था । मैं उन दिनों पारिवारिक झमेलों में परेशान थी सो मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और करीब दो तीन सप्ताह कुछ लिखा भी नहीं। इस समय गूगल प्लस के बंद होने का ऐलान हो रहा था और साथी ब्लॉगर्स फेसबुक का रुख कर चुके थे । गूगल प्लस के बंद होने पर हमारी रचनाओं को नए पाठकों तक पहुँचाने के लिए यह जरूरी भी था। सो करीब पच्चीस दिन के अंतराल के बाद जब मैंने अपनी नई रचना लिखी तो उसे फेसबुक पर साझा करना चाहा। फेसबुक ने उसे अस्वीकार कर दिया। 
  • अब हाल यह है कि यदि मैं किसी और की पोस्ट पर कमेंट में भी ब्लॉग 'चिड़िया' की लिंक देना चाहूँ या कोई और मेरे ब्लॉग की लिंक साझा करना चाहे तो फेसबुक उसे पोस्ट नहीं होने देता। वहाँ एक तरह से 'चिड़िया' को बैन कर दिया गया है। अब मैं अपनी रचनाओं को नए ब्लॉग 'प्रतिध्वनि' पर साझा करूँगी। मुझे विश्वास है कि आप सबका साथ और सहयोग नए ब्लॉग पर भी मिलता रहेगा।