रविवार, 31 दिसंबर 2023

तज़ुर्बे ही सिखाते हैं....

करेंगे प्रेम जो तुमसे
तुम्हारे गम में रोएँगे,
तुम्हें गर नींद ना आए
भला वो कैसे सोएँगे।

नहीं हिम्मत, तुम्हें पूछूँ -
"दर्द का बोझ है कितना"
मिले जो दर्द के हिस्से
सभी खुद ही तो ढोएँगे।

बजाएँ चैन की बंसी
जो अपनों की मुसीबत में,
गुनाहों से सना दामन
वो किस गंगा में धोएँगे ?

मरी संवेदनाएँ हों दफ़न,
जिस दिल की धरती में
नहीं उगती फसल उसमें
बीज जितने भी बोएँगे। 

समंदर पार कर आए,
जरा सी दूर थी मंजिल
मगर सोचा ना था, कश्ती
किनारे ही डुबोएँगे। 

तज़ुर्बे ही सिखाते हैं
फ़लसफ़ा ज़िंदगी का ये
है अपना क्या जमाने में
जिसे पाएँगे - खोएँगे ।


गुरुवार, 7 सितंबर 2023

कृष्ण कन्हैया ( दो प्रार्थना पुष्प )


मनमोहन नटखट कान्हा, घनश्याम मनोहर प्यारा !
मुरलीधर कृष्ण कन्हैया, गिरिधारी, नंद दुलारा !

वंशी को बजा बजाकर, गैयों को चरा चराकर,
माखन को चुरा चुराकर, बन गया सारे ब्रज का प्यारा !

गोकुल में माखन खाया, वृंदावन रास रचाया,
द्वारिका में राज्य बसाया, मथुरा में कंस संहारा !

जब विप्र सुदामा आया, मैत्री का मान बढ़ाया,
दो मुट्ठी चावल के बदले में राजकोष दे डारा ! 

द्रौपदी का चीर बढ़ाया, दुर्योधन मान घटाया,
साड़ी का अंत ना आया, तूने क्या जादू कर डारा !

अर्जुन को मित्र बनाया, गीता का ज्ञान सुनाया, 
जब अर्जुन हिम्मत हारा, तू बन गया परम सहारा !

जब किया भरोसा नरसी, तूने पल भर देर नहीं की,
नानीबाई का भाई बनकर, भक्त का काज सँवारा ।

कहते हैं दया का सागर, तू मोहन नटवर नागर
दर्शन के प्यासे नैना, ज्यों चंद्र चकोर निहारा !
तूने मुझसे ऐसा नाता जोड़ा है
तेरी खातिर हर नाते को तोड़ा है ।
जितना प्यार करूँ तुमसे मैं, थोड़ा है
तूने मुझसे ऐसा नाता जोड़ा है।।

झारी भरकर लाई हूँ गंगाजल से
स्नान करो मैं तुम्हें पोंछ दूँ आँचल से
जितना लाड लडाऊँ तुमको, थोड़ा है।।

तेरी बगिया की मैं मालिन बन जाऊँ
तेरी खातिर फूल सुनहरे चुन लाऊँ
तुझे सजाने ही, फूलों को तोड़ा है।।

दूध कटोरा भर लाई हूँ अब कान्हा
डाला है जिसमें मीठा मिश्री दाना
पी लो, काहे तुमने मुख को मोड़ा है।।

जन्म जन्म से तेरा मेरा नाता है
श्याम सलोने सपनों में तू आता है
मुझे अकेला तूने कभी ना छोड़ा है।।



सोमवार, 7 अगस्त 2023

स्वभाव

मत सिखाओ गुलाब को
कि वह काँटों से लड़ मरे,
कि वह काँटों की 
चुभन का जवाब दुर्गंध से दे ।

काँटों में खिलना, 
सुगंध और सौंदर्य से परिपूर्ण
एक गरिमामय जीवन जीना
यही गुलाब का स्वभाव है ।

मत सिखाओ कमल को
कि वह कीचड़ को गालियाँ दे,
कि वह कोसे अपने जन्म को ।

अपनी उपस्थिति से
कीचड़ का भी मान बढ़ाना,
कीचड़ से ऊपर उठकर
निर्लिप्त होकर जीना,
यही कमल का स्वभाव है।

मत सिखाओ नदिया को
कि सागर से मिलने खातिर
हजारों मील की अथक
यात्रा करना बेवकूफी है,
कि अपनी मिठास बचा रखे,
क्योंकि खारे सागर में समाकर
खारा हो जाना नितांत मूर्खता है ।

'तेरा तुझको अर्पण'
सागर में समर्पण ,
यही नदी का स्वभाव है ।

मत सिखाओ चिड़िया को
कि वह कोयल सा कुहुके,
कि वह मयूरपंखी होकर नाचे,
कि वह बाज, चील, गिद्ध हो जाए ।

थोड़े से दाने पाकर 
संतोष से फुदकना,
प्रेम और विश्वास का
तिनका - तिनका जोड़ना,
रुई से कोमल पंखों को फुलाकर
अपनी चूँ चूँ, चीं चीं में मुखर होना,
यही चिड़िया का स्वभाव है।


शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

है ना जी ?

जितना ज्यादा मन रोएगा

उतना ओंठ हँसेगे जी

तुम अपने जीवन को जी लो

हम अपना जी लेंगे जी !


बच्चों जैसा पाया हमने

कुछ बूढ़ों का चाल चलन

दिखा खिलौना अधिक रंगीला

अब हम वो ही लेंगे जी !


दिखा रहे हैं जो हमदर्दी

वो हैं दर्द के सौदागर

तड़पोगे तुम , ये तो अपना

सौदा बेच चलेंगे जी !


उफनी नदिया, तो घर उजड़े

पर मानव की जिद देखो,

जब उतरेगी बाढ़, वहीं पर

फिर से लोग बसेंगे जी !


इक थैली के चट्टे बट्टे

छिपे हुए रुस्तम हैं सब

आरोपों प्रत्यारोपों के, 

जमकर तीर चलेंगे जी !









रविवार, 30 जुलाई 2023

शिकायत

इसे मान लो चाहे बगावत हमारी
कि तुमसे ही करनी है शिकायत तुम्हारी।

मुहब्बत अगर तुमसे निभाई है हमने
तो नाराजगी भी है अमानत तुम्हारी ।

कभी ना कहा  'प्यार करते हैं तुमसे '
हमेशा ही की है खिलाफत हमारी ।

ये अहसान मानो, छिपा करके दिल में
करी है हमीं ने हिफाजत तुम्हारी ।

मेरी नाखुशी पर क्यूँ तुम मुस्कुराए
अभी भी ना बदली है आदत तुम्हारी ।

हँसाकर रुलाना, सताकर मनाना,
कोई क्यूँ सहे हर शरारत तुम्हारी ?

नहीं अब भरोसा, है हर बात नकली
मिलावट, मिलावट, मिलावट है सारी ।


शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

मेघ मुबारक !


(चित्र मेरी मोबाइल गैलरी से, 
मेरे प्रकृतिप्रेमी बेटे अतुल का है)

धरती को सुंदर श्यामल-से मेघ मुबारक !

और किसानों को हरियाले खेत मुबारक !


अल्हड़ बचपन को कागज की नाव मुबारक !

और जवानी को बारिश का चाव मुबारक !


आसमान को इंद्रधनुष के रंग मुबारक !

झरनों को झर-झर झरने का ढंग मुबारक !


वृक्ष-लताओं को पानी का खेल मुबारक !

बहती नदिया को सागर से मेल मुबारक !


माटी को फिर नए सृजन का गीत मुबारक !

सूनी अँखियों को सपनों का मीत मुबारक !

गुरुवार, 15 जून 2023

प्रार्थनाएँ प्रेम की पर्यायवाची

याद करने के लिए कोई निशानी ढूँढ़ते हो,
और जीने के लिए गुजरी जवानी ढूँढ़ते हो,
भूल से भी भूल ना पाया तुम्हें जो,
तुम खतों में क्यों भला उसकी कहानी ढूँढते हो ?

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टाल दे जब बात को दीवानगी की,
छोड़ दे जब जिद कोई करना किसी से,
तब जरा सा झाँक लेना, पार पलकों के मुँदीं जो,
चल रहे होंगे वहाँ चलचित्र उस गुजरे समय के।

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बूझ लेना गूढ़तम भाषा मेरी अभिव्यक्तियों की,
और भावों की गहनतम तलहटी में उतर जाना ।
जो लगे मन के निकट, उस गीत को साथी बनाकर
सोच का जो उच्चतम होगा, शिखर वह खोज लेना ।

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नियति के बहुरुपिए के और कितने रुप बाकी,
छाँव कितनी भाग्य में है और कितनी धूप बाकी,
वक्त गर साँसों के धागों को उलझने से बचाता,
उम्र के टुकडों को सीकर एक चादर मैं बनाती ।

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और क्या दे पाएगा तुमको भला यह मन फकीरी,
बस दुआओं में बसी है हम फकीरों की अमीरी,
शब्दकोशों में कहाँ इस अर्थ को तुम पा सकोगे,
प्रार्थनाएँ सब मेरी हैं प्रेम की पर्यायवाची  !













रविवार, 22 जनवरी 2023

धूप

माघ की मरमरी ठंड को ओढ़कर,

धूप निकली सुबह ही सुबह सैर पर,

छूट सूरज की बाँहों से भागी, मगर

टूटे दर्पण-सी बिखरी इधर, कुछ उधर !


सूखे पत्तों पे कुछ पल पसरती रही,

धूप पेड़ों से नीचे फिसलती रही,

धूप थम-थम के बढ़ती रही दो पहर,

मिल के पगली पवन से सिहरती रही !


चाय की प्यालियों में खनकती रही,

गुड़ की डलियों में घुलकर पिघलती रही

खींचकर जब रजाई, उठाती है माँ,

धूप चादर में घुस कुनमुनाती रही !


गुनगुनी - गुनगुनी धूप उतरी शिखर,

स्वर्ण आभा से पर्वत को नहला गई,

नर्म गालों को फूलों के, सहला गई,

बस अभी आ रही, कह के बहला गई !


जिद की खेतों ने, 'रुक जाओ ना रात भर'

धूप अँखियों से उनको डपटती रही !

कुछ अटकती रही, कुछ भटकती रही,

हर कहीं थोड़ा - थोड़ा टपकती रही !


घास का मखमली जब बिछौना मिला,

खेलने को कोई मृग का छौना मिला,

साँझ आने से पहले ही वह खो गई,

बँध के सूरज की बाँहों में वह सो गई !