बुधवार, 12 अगस्त 2020

कितना समय लगाया कान्हा !!!

दुनिया ने जब जब दुत्कारा
तूने गले लगाया कान्हा,
मैं अर्जुन सी भ्रमित हो गई
गीता ज्ञान सिखाया कान्हा !!!

सपनों की सच्चाई देखी,
अच्छों की अच्छाई देखी,
अपनेपन में छिपी, कुटिलता-
स्वारथ की परछाईं देखी,
कदम-कदम ठोकर खाकर भी
पागल मन भरमाया कान्हा !!!

सुख की खोज में दर-दर भटका,
द्वार खुला नहीं, फिर भी घट का !
फूलों की चाहत थी किंतु
माया ने काँटों में पटका !
जब बेड़ा भवसागर अटका
तूने पार लगाया कान्हा !!!

बारह महीने सावन-भादों
मेरी आँखों में रहते हैं,
तुम आओ तो चरण पखारूँ
नयनों से झरने बहते हैं !
टूट ना जाए साँस की डोरी
कितना समय लगाया कान्हा !!!

बुधवार, 13 मई 2020

मंजिल नहीं यह बावरे !

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह बावरे !!!

पाँव डगमग हो रहे औ'
नयन छ्लछ्ल हो रहे,
मीत बनकर जॊ मिले थे
वह भरोसा खो रहे।
प्रेम की बूँदों का प्यासा
बन ना चातक बावरे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!

पथ अंधेरा गर मिले तो
आस के दीपक जला ले,
राह में काँटें अगर हों
पाँव को अपने बचा ले !
तू अकेला ही प्रवासी
कोई न तेरे साथ रे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!

याद आएँ जो तुझे, कूचे
कभी इस शहर के
आँसुओं को मत बहाना
घूँट पीना जहर के ।
वेदना मत भूलना यह
भरने ना देना घाव रे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!




शनिवार, 2 मई 2020

अब ना रुकूँगी - 2

छोड़कर बचपना
जरा मैच्योर हो जाऊँ
यही चाहते थे ना तुम ?
कोशिश कर रही हूँ।
बस कुछ ही दिनों में
पचासवाँ लग जाएगा,
पचासों तरह की गलतियाँ
अब भी होती रहती हैं।
मैंने शुरू कर दिया है खुद को समेटना
क्योंकि बिखराव तुम्हें पसंद नहीं।
कभी यही बिखराव ले आया था
तुम्हारी दुनिया में,
बिखरे हुए कुछ टुकड़े छिटककर
तुम्हारे कदमों में पड़े थे,;
उन टुकड़ों पर पैर रख
तुम आगे बढ़ गए।
यहाँ सबको अपने बिखरे टुकड़े
खुद उठाने पड़ते हैं,
फिर उन्हें खुद ही जोड़ना पड़ता है।
बचपन में कागज का फटा नक्शा
जोड़ने की कवायद, तुमने भी की होगी।
वो आसान था, क्योंकि उसके पीछे
एक आदमी बना होता था 
आदमी जोड़ दो, नक्शा जुड़ जाता था।
इन बिखरे टुकड़ों के पीछे
कोई आदमी नहीं बना है ना !
समय लगेगा, जोड़ लूँगी।
फिर एक बार, अब ना रुकूँगी !