रविवार, 22 जनवरी 2023

धूप

माघ की मरमरी ठंड को ओढ़कर,

धूप निकली सुबह ही सुबह सैर पर,

छूट सूरज की बाँहों से भागी, मगर

टूटे दर्पण-सी बिखरी इधर, कुछ उधर !


सूखे पत्तों पे कुछ पल पसरती रही,

धूप पेड़ों से नीचे फिसलती रही,

धूप थम-थम के बढ़ती रही दो पहर,

मिल के पगली पवन से सिहरती रही !


चाय की प्यालियों में खनकती रही,

गुड़ की डलियों में घुलकर पिघलती रही

खींचकर जब रजाई, उठाती है माँ,

धूप चादर में घुस कुनमुनाती रही !


गुनगुनी - गुनगुनी धूप उतरी शिखर,

स्वर्ण आभा से पर्वत को नहला गई,

नर्म गालों को फूलों के, सहला गई,

बस अभी आ रही, कह के बहला गई !


जिद की खेतों ने, 'रुक जाओ ना रात भर'

धूप अँखियों से उनको डपटती रही !

कुछ अटकती रही, कुछ भटकती रही,

हर कहीं थोड़ा - थोड़ा टपकती रही !


घास का मखमली जब बिछौना मिला,

खेलने को कोई मृग का छौना मिला,

साँझ आने से पहले ही वह खो गई,

बँध के सूरज की बाँहों में वह सो गई !


13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना सोमवार 23 ,जनवरी 2023 को
    पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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  2. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति। शब्द नहीं है प्रशंसा के लिए।

    ~संचिता

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  3. लाजवाब पंक्तियां!! शीत ऋतु में धूप की सुंदर व्याख्या।

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  4. चाय की प्यालियों में खनकती रही,
    गुड़ की डलियों में घुलकर पिघलती रही
    खींचकर जब रजाई, उठाती है माँ,
    धूप चादर में घुस कुनमुनाती रही !
    सर्दियों की धूप और उसके नाना प्रकार के रंगों का अनुपम चित्रण मीना जी ! अत्यंत सुन्दर सृजन ।

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  5. वाह! धूप की अठखेलियाँ आपके शब्दों में सजीव हो उठी हैं, सुंदर बिंबों से सजी रचना!

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  6. क्या बात,बहुत खूब दी कितना सुंदर लिखा है आपने रचना पढ़कर होंठों पर मुस्कान आ गयी।
    हर पहर के धूप के रूप का मनमोहक चित्रण।
    ---
    धूप की उंगलियों ने
    छू लिया अलसाया तन
    सर्द हवाओं की शरारतों से
    तितली-सा फुदका मन
    सस्नेह प्रणाम दी।
    सादर।

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  7. माघ की मरमरी ठंड को ओढ़कर,

    धूप निकली सुबह ही सुबह सैर पर,

    सुबह की सैर पर निकली धूप
    वाह!!!

    साँझ आने से पहले ही वह खो गई,

    बँध के सूरज की बाँहों में वह सो गई !

    पूरी धरती का भ्रमण
    क्या बात...
    बहुत ही लाजवाब ।

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  8. माघ के आगमन को बाखूबी लिखा है ... ठण्ड अभी भी बिस्तर में है पर मौसम माघ का दोनों का मजा देता है ...

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  9. माघ की मरमरी ठंड को ओढ़कर,

    धूप निकली सुबह ही सुबह सैर पर,

    छूट सूरज की बाँहों से भागी, मगर

    टूटे दर्पण-सी बिखरी इधर, कुछ उधर !

    निशब्द हूं, सर्दियों की धूप सी मनोहारी सृजन मीना जी, 🙏

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