शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

अपराजिता ही रहूँगी !

भागीरथी की धार सी
कल्पांत तक मैं बहूँगी
अपराजिता ही थी सदा
अपराजिता ही रहूँगी।

वंचना विषपान करना ही
मेरी नियति में है,
पर मेरा विश्वास निशिदिन
प्रेम की प्रगति में है।
संवेदना की बूँद बन मैं,
हर नयन में रहूँगी !
अपराजिता ही थी सदा
अपराजिता ही रहूँगी।

पारंगता ना हो सकी
व्यापार में, व्यवहार में!
हरदम ठगी जाती रही
इस जगत के बाजार में।
फिर भी सदा सद्भाव का,
संदेश देती रहूँगी ।
अपराजिता ही थी सदा
अपराजिता ही रहूँगी।

मैं वेदना उस सीप की
जो गर्भ में मोती को पाले,
मैं रोशनी उस दीप की
जो ज्योत आँधी में सँभाले !
अंबुज कली सी कीच में
खिलती हूँ, खिलती रहूँगी !
अपराजिता ही थी सदा
अपराजिता ही रहूँगी ।।




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