बुधवार, 13 मई 2020

मंजिल नहीं यह बावरे !

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह बावरे !!!

पाँव डगमग हो रहे औ'
नयन छ्लछ्ल हो रहे,
मीत बनकर जॊ मिले थे
वह भरोसा खो रहे।
प्रेम की बूँदों का प्यासा
बन ना चातक बावरे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!

पथ अंधेरा गर मिले तो
आस के दीपक जला ले,
राह में काँटें अगर हों
पाँव को अपने बचा ले !
तू अकेला ही प्रवासी
कोई न तेरे साथ रे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!

याद आएँ जो तुझे, कूचे
कभी इस शहर के
आँसुओं को मत बहाना
घूँट पीना जहर के ।
वेदना मत भूलना यह
भरने ना देना घाव रे !!!

चल, दूर कहीं चल मन मेरे
मंजिल नहीं यह, बावरे !!!




शनिवार, 2 मई 2020

अब ना रुकूँगी - 2

छोड़कर बचपना
जरा मैच्योर हो जाऊँ
यही चाहते थे ना तुम ?
कोशिश कर रही हूँ।
बस कुछ ही दिनों में
पचासवाँ लग जाएगा,
पचासों तरह की गलतियाँ
अब भी होती रहती हैं।
मैंने शुरू कर दिया है खुद को समेटना
क्योंकि बिखराव तुम्हें पसंद नहीं।
कभी यही बिखराव ले आया था
तुम्हारी दुनिया में,
बिखरे हुए कुछ टुकड़े छिटककर
तुम्हारे कदमों में पड़े थे,;
उन टुकड़ों पर पैर रख
तुम आगे बढ़ गए।
यहाँ सबको अपने बिखरे टुकड़े
खुद उठाने पड़ते हैं,
फिर उन्हें खुद ही जोड़ना पड़ता है।
बचपन में कागज का फटा नक्शा
जोड़ने की कवायद, तुमने भी की होगी।
वो आसान था, क्योंकि उसके पीछे
एक आदमी बना होता था 
आदमी जोड़ दो, नक्शा जुड़ जाता था।
इन बिखरे टुकड़ों के पीछे
कोई आदमी नहीं बना है ना !
समय लगेगा, जोड़ लूँगी।
फिर एक बार, अब ना रुकूँगी !

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

क्या वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं ?

धर्म से रिश्ता सब कुछ है,क्या वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं?
ओ भाई मेरे,ओ बंधु मेरे,क्या अमन से रिश्ता कुछ भी नहीं?

जिस माटी में तुम जन्मे, खेले-खाए और पले - बढ़े
उस माटी से गद्दारी क्यों, ये कैसी जिद पर आज अड़े ?
क्या अक्ल गई मारी तेरी, किसके बहकावे में बिगड़े,
जी पाओगे अपने दम पर, क्या आपस में करके झगड़े?
क्यूँ समझाना बेकार हुआ, क्यूँ शत्रु हुए मानवता के?
क्यूँ वतनपरस्ती भूल गए, क्या यही सिखाया मजहब ने?

शाख से ही रिश्ता है क्या, इस चमन से रिश्ता कुछ भी नहीं?
धर्म से रिश्ता सब कुछ है और वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं?

क्यों छेद कर रहे उसमें ही, जिस थाली में तुम खाते हो?
जो हाथ तुम्हारे रक्षक हैं, उनको ही तोड़ने जाते हो ?
हम एक रहें और नेक रहें, क्या यह मानव का फर्ज़ नहीं?
यह धरती तेरी भी माँ है, माँ का तुझ पर कोई कर्ज नहीं?
नफरत से नफरत बढ़ती है, क्यों आग लगाने को निकले?
इक सड़ी सोच को लेकर क्यों, ईमान मिटाने को निकले?

क्या तेरी नजर में भाई मेरे, इंसान से रिश्ता कुछ भी नहीं?
धर्म से रिश्ता सब कुछ है और वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं?