सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

मौन दुआएँ अमर रहेंगी !

श्वासों की आयु है सीमित
ये नयन भी बुझ ही जाएँगे !
उर में संचित मधुबोलों के
संग्रह भी चुक ही जाएँगे !
है स्पर्श का सुख भी क्षणभंगुर
पर मौन दुआएँ, अमर रहेंगी।

बगिया में अनगिन फूल खिले,
अमराई भी है बौराई ।
बेला फूला, तरुशाखाएँ
पल्लव पुष्पों से गदराईं ।

फूलों के कुम्हलाने पर भी,
मधुमास चले जाने पर भी !
खुशबू को फैलानेवाली
मदमस्त हवाएँ अमर रहेंगी।
मौन दुआएँ, अमर रहेंगी।

नदिया में सिरा देना इक दिन
तुम गीत मेरे, पाती मेरी
धारा में बहते दीपों संग
बहने देना थाती मेरी !

स्मृति में पावन पल भरकर
लौ काँपेगी कुछ क्षण थरथर !
जलते दीपक बुझ जाएँगे
बहती धाराएँ अमर रहेंगी।
मौन दुआएँ, अमर रहेंगी।

ये भाव निरामय, निर्मल-से
कोमलता में हैं मलमल-से
मन के दूषण भी हर लेंगे
ये पावन हैं गंगाजल-से !

मत रिक्त कभी करना इनको
ये मंगल कलश भरे रखना !
ना तुम होगे, ना मैं हूँगी,
उत्सव की प्रथाएँ अमर रहेंगी ।
मौन दुआएँ, अमर रहेंगी।






शनिवार, 25 जनवरी 2020

है वही प्रार्थना शुभकारी !

जिन वादों में, संवादों में
ना हृदय कहीं, ना भाव कहीं।
संबंध नहीं, व्यापार हैं वो
अपनों - सा जहाँ बर्ताव नहीं !

आँधी के संग उड़ते-उड़ते,
माटी सोचे, सूरज छू लूँ !
लेकिन जिस आँगन में खेली,
उस आँगन को कैसे भूलूँ !
उपकृत होकर अपकार करे
माटी का यह, स्वभाव नहीं !
संबंध नहीं, व्यापार हैं वो
अपनों - सा जहाँ बर्ताव नहीं !

जब पलकों में पलनेवाले,
सपनों के टुकड़े हो जाएँ !
जिनसे जोड़ा दो हृदयों को,
वो टाँके उधड़े हो जाएँ !
तब लगता है, इस दुनिया में
निश्छलता का निर्वाह नहीं।
संबंध नहीं, व्यापार हैं वो
अपनों - सा जहाँ बर्ताव नहीं !

व्याकुलता के, चंचलता के,
अस्थिरता के, भावुकता के !
ऐसे पल भी निस्सार नहीं,
वे हैं प्रमाण मानवता के !
क्या निर्मल होगा गंगाजल
गंगा में यदि, प्रवाह नहीं !
संबंध नहीं, व्यापार हैं वो
अपनों - सा जहाँ बर्ताव नहीं !

आह्लाद - विह्वलता का संगम,
हो अश्रु - हास्य का जहाँ मिलन !
उस पावन क्षण में जीने को,
देवों का भी करता है मन ।
है वही प्रार्थना शुभकारी
जिसमें पाने की चाह नहीं !
संबंध नहीं, व्यापार हैं वो
अपनों - सा जहाँ बर्ताव नहीं !

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

द्वीप


अतलस्पर्शी गहन मौन का
एक महासागर फैला है
तुमसे मुझ तक,मुझसे तुम तक !
दो वीराने द्वीपों-से हम,
अपनी - अपनी सीमाओं में
सिमटे, ठहरे, बद्ध पड़े हैं !

ज्वार और भाटा आने से
इन सुदूर द्वीपों पर भी कुछ
हलचल-सी मच ही जाती है !
शंख, सीपियाँ, सच्चे मोती
कभी भेजना, कभी मँगाना
अनायास हो ही जाता है !

मैं इस तट कुछ लिख देती हूँ
नीलम-से जल की स्याही से
तुम उस तट पर कुछ लिख देना !
लहरों के संग बह आएँगी
लिखी पातियाँ इक दूजे तक
चंदा से कह देना, पढ़ दे !

कितना है आश्चर्य, नियति का
सीमाएँ गढ़ दीं असीम की,
सागर के भी तट होते हैं !
मन भी एक महासागर है
फिर लौटी हैं भाव तरंगें
कुछ प्रतिबंधित क्षेत्रों को छू !

आते-जाते तूफानों में
जाने कितनी दूर रह गईं
मेरे गीतों की नौकाएँ !
खामोशी का गहन समंदर,
दो द्वीपों पर मचे शोर का
कब तक साक्षी बना रहेगा ?