उफ्फ ! कितना लिख रहे हैं लोग !
लिख-लिख कर दरो दीवारों पर,
बंदूकों पर, औजारों पर,
तटबंधों पर, मँझधारों पर,
जो भी मन में हजम ना हुआ
उसकी उल्टी कर रहे हैं लोग !
उफ्फ ! कितना लिख रहे हैं लोग !!!
लिखने से पहले पढ़ भी लो,
अपने विचार को गढ़ भी लो,
चेतना शिखर पर चढ़ भी लो !!!
नशा ख्याति का, बिना पिए ही
देखो कैसे झूम रहे हैं लोग !
उफ्फ ! कितना लिख रहे हैं लोग !!!
लेखन के इन बाजारों में,
कविताओं के गलियारों में,
इन जलसों के चौबारों में,
पठनीय कहीं छुप जाता है
बकवासों की भरमारों में !!!
समय की फिर भी कमी का
काहे रोना रो रहे हैं लोग !
उफ्फ ! कितना लिख रहे हैं लोग !!!
साधन सुलभ पहुँच के भीतर,
लिख मारो सारे पन्नों पर ,
कलम दवात की नहीं जरूरत,
हल्का होता दिल लिख-लिखकर
फिर क्यों बोझिल हो रहे हैं लोग ?
उफ्फ !!!!...............
( इस कविता को किसी से जोड़ा ना जाए, ये भी एक बकवास ही है )