जहाँ मिल रहे गगन धरा
मैं वहीं तुमसे मिलूँगी,
अब यही तुम जान लेना
राह एकाकी चलूँगी ।
ना कहूँगी फ़िर कभी
कि तुम बढ़ाओ हाथ अपना,
मैं नयन तुमको बसाकर
देखती हूँ एक सपना !!!
संग मेरे तुम ना आओ,
रूठ जाऊँ, मत मनाओ
पर तुम्हारी राह में मैं
फूल बनकर तो खिलूँगी !
फ़िर वहीं तुमसे मिलूँगी !!!
जहाँ मिल रहे गगन धरा
जहाँ मिल रहे गगन धरा
मैं वहीं तुमसे मिलूँगी ।
अब यही तुम जान लेना
राह एकाकी चलूँगी ।
श्वास की सरगम पे पल पल
नाम गूँजेगा तुम्हारा,
चेतना के रिक्त घट में
प्रेम की पीयूष धारा !
मैं उसी अमि धार से
अभिषेक प्रियतम का करूँगी,
बाट जोहूँगी युगों तक,
दीप बनकर मैं जलूँगी !
फिर वहीं तुमसे मिलूँगी !!!
जहाँ मिल रहे गगन धरा
चेतना के रिक्त घट में
प्रेम की पीयूष धारा !
मैं उसी अमि धार से
अभिषेक प्रियतम का करूँगी,
बाट जोहूँगी युगों तक,
दीप बनकर मैं जलूँगी !
फिर वहीं तुमसे मिलूँगी !!!
जहाँ मिल रहे गगन धरा
मैं वहीं तुमसे मिलूँगी ।
अब यही तुम जान लेना
राह एकाकी चलूँगी ।