गुरुवार, 24 मई 2018

जरूरत क्या दलीलों की !

हँसेंगे लोग तुम पर, बात ना करना उसूलों की
मोहब्बत की, वफा की, प्यार की बातें फ़ुज़ूलों की।

लगाएँगे ठहाके, पीटकर ताली हँसेगे सब
चलो बचकर, यहाँ माफी नहीं मिलती है भूलों की।

झूठ तो राज करता है, बिना ही तख्तो-ताज के
यहाँ दरकार है सच को वकीलों की, अपीलों की।

जश्न में लोग जितने थे, जनाजे में कहाँ उतने
कहाँ चाहे कोई काँटे, सभी को चाह फूलों की ।

जो तुम हारे तो मैं हारी, जो तुम जीते तो मैं जीती
करूँ क्यों प्यार को साबित,जरूरत क्या दलीलों की।

सोमवार, 21 मई 2018

आस

आस तो थी तुमसे,
पर कोई खास नहीं थी ।
इतनी सी थी कि
जब सारी दुनिया खड़ी हो
मेरे विरोध में,
तब तुम को अपने साथ
खड़ा पाऊँ ।
मेरी खुद्दारी पर
तुम्हें नाज़ करता देखूँ,
मेरा स्वाभिमान ही
तुम्हारा मान - सम्मान हो और
जब दुनिया के कदम उठें
मेरा स्वाभिमान कुचलने को,
तब तुम उसे हथेलियों में समेट
अपने हृदय में छुपा लो !
लेकिन तुम्हारा अपना ही
आत्माभिमान इतना व्यापक हो गया
कि तुम्हारे हृदय में अब
किसी और के लिए जगह 
बची ही नहीं है !!!
फिर भी, 
मैं इंतजार करूँगी,
शायद कभी तुम्हारे हृदय के
किसी कोने में
जरा सी जगह मिल जाए....
मुझे नहीं, मेरी खुद्दारी को !
मुझे नहीं, मेरे स्वाभिमान को !!
मुझे नहीं, मेरी भावनाओं को !!!

रविवार, 20 मई 2018

नदिया के दो तट

युग युग से चलते संग, मगर
अभिशाप विरह का सहते हैं,
मजबूर नियति के हाथों में
निःशब्द व्यथा को कहते हैं !
हम जीवन नदिया के दो तट !!!

जलती है कितने जन्मों से,
प्राणों की ज्योत प्रतीक्षा में,
फिर जन्मों का अनुबंध करूँ,
तुम आ जाओ तो बंद करूँ,
मैं अपने हृदय - द्वार के पट !!!

मिलने की आस लगाएँगे,
मरकर भी खुले रह जाएँगे,
प्रिय दर्शन को खुद प्यासे रह,
गगरी जल की छलकाएँगे,
मेरे दो नयनों के पनघट !!!

मचलें जब सागर की लहरें,
चंदा को बाँहों में भरने,
जब उफने उदधि किनारों पर,
तब एकाकी मँझधारों पर,
ढूँढ़े नैया अपना केवट !!!

कान्हा भी नहीं, राधा भी नहीं
ना मीठी ध्वनि मुरलिया की,
क्यूँ प्रीत की आज भी रीत वही,
क्यूँ राह तकें उस छलिया की,
यमुना का तट और वंशी - वट !!!
(चित्र गूगल से साभार)