सोमवार, 3 दिसंबर 2018

काश ! ज़िंदगी कविता होती !

काश ! ज़िंदगी कविता होती !
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँटकर,
अपने हिस्से हम लिख लेते !!!

कभी-कभी ऐसा भी होता,
मेरी बातें तुम लिख देते
और तुम्हारी लिखती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !!!
^^^^^^^^^^^^^^^^^^

काश ! ज़िंदगी कविता होती !
लिखते-लिखते दिन हो जाता,
पढ़ते-पढ़ते रातें होतीं,
लफ्जों की ही धड़कन होती,
लफ्जों की ही साँसें होतीं।
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँटकर
अपने हिस्से हम जी लेते !!!

कभी- कभी ऐसा भी होता,
मेरी साँसें तुम जी लेते
और तुम्हारी जीती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !
^^^^^^^^^^^^^^^^^

काश ! ज़िंदगी कविता होती !
तुकबंदी करते-करते हम,
इक-दूजे की 'तुक' हो जाते,
मैं हो जाती एक अंतरा
और दूसरा तुम हो जाते।
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँट कर
अपने हिस्से हम गा लेते !!!!

कभी-कभी ऐसा भी होता,
मेरा नगमा तुम गा देते
और तुम्हारा गाती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !!!
^^^^^^^^^^^^^^^^^^

काश ! ज़िंदगी कविता होती !!!

5 टिप्‍पणियां:

  1. जी दी
    जीवन ऐसी कविता है, जिसमें कभी आनंद है,तो कभी रुदन के स्वर भी..
    प्रणाम।

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  2. बहुत सुन्दर सृजन 👏 👏 👏 मीना जी

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  3. ज़िन्दगी सच में निहारें हम तो एक तुकान्त ही है ... अगर ना भी हो तो एक उपन्यास तो है ही ... जिसके नायक-नायिका हम स्वयं होते हैं ... बस भूमिका और समीक्षा अपने वश में नहीं होती ... शायद ...
    बेहतर संवेदना से भरी रचना ...

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  4. ज़िंदगी भी तो कविता जैसी ही है न दी कभी समझ आती है और कभी उलझ जाती है।
    अति सुंदर अभिव्यक्ति दी..हमेशा की तरह।

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  5. काश ! ज़िंदगी कविता होती !
    तुकबंदी करते-करते हम,
    इक-दूजे की 'तुक' हो जाते,
    मैं हो जाती एक अंतरा
    और दूसरा तुम हो जाते।
    थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँट कर
    अपने हिस्से हम गा लेते !!!
    प्रिय मीना म काश भावुक मन की ये कल्पना साकार हो पाती ! जीवन इतना सरल कहाँ है सखी ?!

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