गुरुवार, 10 जून 2021

तारे हैं दूर आसमां में

तारे हैं दूर आसमां में 

और जमीं पे हम,

बस, इक सितारा छूने का 

अरमां लिए हुए।


सबको कहाँ मिलते हैं घर, 

वादी में गुलों की।

काँटों के घरौंदों में भी, 

रहना तो सीखिए।


अच्छा किया, तुमने मेरी 

वफा पे शक किया,

कुछ और सबक सीखने थे, 

सीख ही लिए।


इस मोड़ से ऐ जिंदगी,

चल राह बदल लें,

मिलने के जो मकसद थे,

सभी हमने जी लिए ।


उठ्ठी लहर सागर से, 

किनारे पे मर मिटी।

गहराइयों के राज 

किनारों ने पढ़ लिए।


क्यूँ इस तरहा से कैद में, 

कटती है जिंदगी,

हैं दर भी, दरीचे भी,

जरा खोल लीजिए। 


है उम्र के नाटक का, 

अभी अंक आखिरी।

ना भूल सकें लोग, 

इस तरहा से खेलिए। 






मंगलवार, 25 मई 2021

फिरौती

कभी वह भी प्रकृति से जुड़ी थी,
किताबों में खोई रहती थी,
जिंदगी में क्या चाहिए, पूछने पर
जवाब देती थी - एक हरा भरा शांत कोना
और एक पुस्तकों से भरी लाइब्रेरी।
उसकी खुशियाँ भी मासूम थीं
उसी की तरह,
उसकी ख्वाहिशें भी भोली थीं
बिल्कुल उसी की तरह ।
धीरे धीरे दुनिया की नजर लगी,
उसकी ख्वाहिशें उसकी न रह गईं
उसकी खुशियों पर दूसरों की
चाहतों का रंग चढ़ गया ।
उसके बगीचे और उसकी लाइब्रेरी में
उसकी मरी हुई इच्छाओं की सड़ांध भर गई,
उसकी चिड़ियों और बुलबुलों ने
झरोखों में आकर चहकना छोड़ दिया,
तितलियाँ भी उस हरियाले कोने का
रास्ता भूल गईं । 
और हद तो तब हो गई जब
उसके विचारों का अपहरण करके
उन्हें कालकोठरी में बंद कर दिया गया । 
शायद फिरौती में माँगी गई रकम
उसकी जिंदगी से भी अधिक है,
अपनी तमाम साँसों को देकर भी वह
अपने विचारों को छुड़वा नहीं पाएगी !!!

शनिवार, 13 मार्च 2021

मुस्कुराए भर थे हम तो...


मुस्कुराए भर थे हम तो
देखकर उनकी तरफ,
बात थी छोटी सी, मगर
बन गई कहानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो....

उम्र तो बस उम्र थी,
बीतती चली गई।
बचपना अब भी वही,
अब भी वही नादानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो.....

ग़र्द उस शीशे पे जाने
कब से है जमी हुई,
है नहीं आसां मिटाना
वक्त की निशानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो.....

बादलों से फिर झरेंगे
गीत मेरे इश्क के,
सूखते दरिया में होंगी
फिर वही रवानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो.....

हर बरस बरसेगा सावन
ये बरस लौटेगा कब ?
लौटकर आती नहीं
गुजरी हुई जवानियाँ !
       मुस्कुराए भर थे हम तो......