प्रभातकाल -
ज्योतिपुंज वह भव्य भास्कर
रश्मिकोष को लुटा रहा,
काट तेज की तलवारों से
तमस,कुहासा हटा रहा !
अनगिन नक्षत्रों पर भारी
एक अकेला ही रविराज,
लज्जित हो निशिकांत छिप गया
बजने लगे विजय के साज !
पुलक - पुलककर भानुप्रिया ने
किए निछावर मुक्ताथाल,
आँचल में समेटकर मोती
दूर्वा - तृणदल हुए निहाल !
स्वर्णजटित पट पहन सजे
मेघों ने बढ़कर की जुहार,
विरुदावली सुनाते पंछी
पवन बजाती मधुर सितार !
पुष्प बिछाकर सतरंगी, तब
हरे मखमली कालीनों पर,
कनक मुकुट धारण कर तरुवर
स्वागत हेतु हुए तत्पर !
अब पहन राजसी वेष चला
साम्राज्य निरीक्षण को सत्वर,
कर्मोद्यत करने सृष्टि को
स्वयं कर्मरत हुआ दिवाकर !
बावरे मन की,
बावरी ख्वाहिश !
बावरी ख्वाहिश का क्या ?
पूरी ना होगी,
ना होनी थी जो,
पगली सी ख्वाहिश का क्या ?
कागज की कश्ती में
दरिया को कोई,
पार करे भी तो कैसे ?
ज़िंदा ख्वाबों को
दफनाए केैसे,
कॊई मरे भी तो कैसे ?
आजमाया दुनिया ने
आजमा लो तुम भी,
अब आजमाइश का क्या ?
बावरे मन की
बावरी ख्वाहिश !
बावरी ख्वाहिश का क्या ?
प्रेम गर पाप है
तो कुदरत है पापी,
पापी हुआ रब !
बूँदों को बाँधे थी
पलकों की डोरी,
खुलने लगी अब !
दिखती ना छुपती,
जलती ना बुझती,
अब ऐसी आतिश का क्या ?
बावरे मन की,
बावरी ख्वाहिश !
बावरी ख्वाहिश का क्या ?
ना उसके ओंठ हिलते थे,
ना कोई राग बहता था,
मगर रंगीन पंखों को,
वो जिस दम फड़फड़ाती थी,
कोई नगमा मचलता था
हवाएँ गुनगुनाती थीं !!!
बहारों का संदेशा ले,
वो जब उड़ती थी, थमती थी,
सरसराते थे रंग जीवंत होकर
फूल-फूल में, कली-कली में !
उतर आते थे शाखों पर,
फ़िजाओं में, हजारों रंग बिखरते थे !!!
कोई सैय्याद गुलशन में
लगाए घात बैठा था !!!
बड़ी नापाक नजरों से
लगाए ताक बैठा था !!!
वो अनजान सी बेखबर घूमती थी
फूलों से मिलती, कली चूमती थी !
लगी हाथ जालिम के, कसमसाई
वो नन्ही सी जान, नहीं छूट पाई !
सहमा सा गुलशन, सहमी सी बगिया,
खामोश सारे, फूल और कलियाँ !
तड़पकर वो अपना, दम तोड़ती है,
हत्यारी उंगलियों पर भी, रंग छोड़ती है !!!