रविवार, 26 नवंबर 2017

बूँद समाई सिंधु में !

प्रीत लगी सो लगि गई,
अब ना फेरी जाय ।
बूँद समाई सिंधु में,
अब ना हेरी जाय ।।

हिय पैठी छवि ना मिटे,
मिटा थकी दिन-रैन ।
निर्मोही के संग गया,
मेरे चित का चैन ।।

परदेसी के प्रेम की,
बड़ी अनोखी रीत ।
बिना राग की रागिनी,
बिना साज का गीत ।।

नयन भरे तो यों भरे,
हो गए नदी - समंद ।
कस्तूरी मृग बावरा,
खोजत फिरे सुगंध ।।

पुष्प-पुष्प फिरता भ्रमर,
रस चाखे, उड़ि जाय ।
मुरझाए, सूखे सुमन,
तब भँवरा नहिं आय ।।

पिहू-पिहू पपिहा करै,
घन को ताके मोर ।
प्रीति हमारी जानिए,
जैसे चंद्र - चकोर ।।
              --- मीना शर्मा ----

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

प्रेम

व्यंग्य के तीरों से भरे
तरकश से निकला
फिर एक नया तीर
और उतर गया,सीधा
उसके कलेजे में !

कलेजे में तो सिर्फ
एक नया छिद्र हुआ,
वहाँ कुछ था ही कहाँ
जो बहता, रीतता !

आँखें तो झरोखा रही थीं,
दिल की मासूमियत और
इरादों की पाकीज़गी का,
नहीं सहा गया दर्द 
दो आँखों से, जमाने भर का !

आँखों की सहनशीलता
जवाब दे गई
लहू की धारा आँखों से
बह निकली !

अपने-पराए, सारे घबराए
पास ना कोई आए
लहू का लाल रंग
डरा देता है सबको !

कुछ समय बाद देखा
जमीं पर लाल अक्षरों में
उसी लहू के रंग से
उसने लिखा था एक शब्द
ढ़ाई आखर का --
- प्रेम -



रविवार, 19 नवंबर 2017

शहद है तू !



मेरे जीने की वजह है तू
जमाना हार, फतह है तू !!!

मैं अँधेरों से नहीं डरती अब
मेरी रातों की, सहर है तू !!!

तेरे होने से मुकम्मल हूँ मैं
जिस्म हूँ मैं, तो रूह है तू !!!

मेरे ओठों की तबस्सुम तुझसे
ज़िंदगी से मेरा रिश्ता है तू !!!

तू सिर्फ चाँद और सूरज ही नहीं,
मेरी आँखों का सितारा है तू !!!

तेरे माथे को चूमकर कह दूँ
इतना मीठा है, शहद है तू !!!
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(बेटे अतुल के लिए)