शनिवार, 29 जनवरी 2022

भावनाएँ मेरी अब प्रवासी हुईं

इस धरा पर तो मधुमास फिर छा गया,

किंतु पतझड़ मेरे मन की वासी हुई ।

शब्द परदेस में जाके सब बस गए,

भावनाएँ मेरी अब प्रवासी हुईं ।। 


जिसके प्रतिनाद की थी प्रतीक्षा मुझे,

मन की घाटी से वह गीत गुजरा नहीं ।

रोक लेना जिसे, मेरा अधिकार था,

कुछ क्षणों को भी वह भाव ठहरा नहीं ।

राह तक ना सकी उसकी प्रतिबद्धता,

मेरे आने में देरी जरा - सी हुई ।।

शब्द परदेस में जाके सब बस गए

भावनाएँ मेरी अब प्रवासी हुईं ।। 


सुख की मैंने कभी, खोज ना की कहीं,

वेदना से मेरा प्रेम शाश्वत रहा।

जिसको पाना असंभव, वही चाह थी,

मेरी चाहत का हर अंक अद्भुत रहा।

खिलखिलाहट सजाती रही मंच को,

कैद परदों के भीतर उदासी हुई ।।

शब्द परदेस में जाके सब बस गए

भावनाएँ मेरी अब प्रवासी हुईं ।। 


जीविका का नहीं, प्रश्न जीने का था,

खोज जीवन की हर श्वास जारी रही ।

एक टुकड़ा भी जीवन का दे ना सकी,

ज़िंदगी, ज़िंदगीभर भिखारी रही।

कोष श्वासों का भी, यूँ ही लुटता गया,

कुछ मिला ही नहीं, जब तलाशी हुई ।।

शब्द परदेस में जाके सब बस गए

भावनाएँ मेरी अब प्रवासी हुईं ।।

               ©  - मीना शर्मा 















शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

तलाश

दिन पर दिन बढ़ती जा रही है

दिनभर की भाग दौड़,

कुछ उम्र, कुछ जिम्मेदारियों 

और कुछ सेहत के

तकाजों का जवाब देते-देते,

पस्त हो जाता है शरीर और मन,

दिन भर !!!

कभी तितलियों और पंछियों को

निहारते रहने वाली निगाहें,

अब दिनभर,

मोबाइल और लैपटॉप से जूझतीं हैं,

ऑनलाइन रहती हैं निगाहें दिन भर,

और मन रहता है ऑफलाइन।

बगिया के पौधों को दिन में कई कई बार

सहलानेवाले हाथ,

अब जीवन संघर्ष की उलझी डोर को 

सुलझाते-सुलझाते दुखने लगे हैं।

दिन तो गुजर जाता है

पर जब रात गहराती है, 

मन की सुनसान वीथियों में

तुम्हारा हाथ पकड़कर चल देते हैं

मेरे मनोभाव,

उस छोटे से कोने की तलाश में,

जहाँ चिर विश्रांति मिल सके।

सुनो, एक सवाल पूछना है।

इस तलाश का अंत कब होगा?


सोमवार, 16 अगस्त 2021

कितनी यादें दे जाते हैं !

लोग पुराने जब जाते हैं,
कितनी यादें दे जाते हैं !
कसमें भी कुछ काम ना आतीं,
वादे भी सब रह जाते हैं !

पीपल के पत्तों के भी
पीले होने की रुत होती है,
पर मानव के साथी क्यूँकर
बेरुत छोड़ चले जाते हैं ?

लोग पुराने जब जाते हैं,
कितनी यादें दे जाते हैं !

यादें बरगद के मूलों सी
मीलों फैलें हृदय धरा में,
संग साथ के वे सीमित क्षण
बिछड़, अपरिमित हो जाते हैं !

लोग पुराने जब जाते हैं
कितनी यादें दे जाते हैं।

सूखी - सूखी नयन नदी पर
बरस पड़ें जब घन भावों के,
सजल, सघन, संचित बूँदों से
तब तट युग्म नमी पाते हैं। 

लोग पुराने जब जाते हैं
कितनी यादें दे जाते हैं !

कभी गोद में हमको लेकर 
जॊ दिखलाते  चंदा मामा !
हमें बिलखता छोड़, गगन के
तारे वे क्यों बन जाते हैं ?

लोग पुराने जब जाते हैं
कितनी यादें दे जाते हैं।

विशेष : इस कविता का पहला छंद ना जाने क्यों कल सुबह से मन में घुमड़ता रहा था। विचार भी आया, ये कैसी पंक्तियाँ आ रही हैं मन में ? अजीब सी बेचैनी भी थी दिलो दिमाग में। फिर सोचा कि कल रात देखे गए एक भावुक व्लॉग (vlog) का असर होगा, जिसमें शहर के वासी को बरसों बाद गाँव लौटने पर पता चलता है कि उसके गाँव के कुछ पुराने लोग, कुछ साथी अब नहीं रहे। 

खैर, मैंने दोपहर में करीब एक बजे पंक्तियों को लिख लेने का सोचा। दूसरा छंद पूरा हुआ कि मम्मी का फोन आया। मेरी मुँहबोले भाई की धर्मपत्नी, जिन्हें पच्चीस साल से लगातार राखी बाँधती रही हूँ मैं, वे अस्पताल में वेंटिलेटर पर हैं। शायद एकाध घंटा और निकालें। मैं स्तब्ध रह गई। भाभी उम्र में मेरी मम्मी से दो तीन साल ही छोटी थीं। मुझे तो गोद में खिलाया है। बड़ा आत्मीय रिश्ता है उनसे।

बेसब्र होकर उनकी बहू को फोन किया। वह रोते रोते बोली कि दीदी, माँ अभी अभी चली गईं। 

कविता के अंतिम दो छंद आँखों से झरते अश्रुओं के साथ पाँच मिनट में उतर आए। दिल से दिल के ऐसे रिश्तों के जुड़ाव और बिछोह को छठी इंद्रीय ने  अनेक बार महसूस किया और चेताया है। परंतु इस रूप में पहली बार चेताया है।