अतलस्पर्शी गहन मौन का
एक महासागर फैला है
तुमसे मुझ तक,मुझसे तुम तक !
दो वीराने द्वीपों-से हम,
अपनी - अपनी सीमाओं में
सिमटे, ठहरे, बद्ध पड़े हैं !
ज्वार और भाटा आने से
इन सुदूर द्वीपों पर भी कुछ
हलचल-सी मच ही जाती है !
शंख, सीपियाँ, सच्चे मोती
कभी भेजना, कभी मँगाना
अनायास हो ही जाता है !
मैं इस तट कुछ लिख देती हूँ
नीलम-से जल की स्याही से
तुम उस तट पर कुछ लिख देना !
लहरों के संग बह आएँगी
लिखी पातियाँ इक दूजे तक
चंदा से कह देना, पढ़ दे !
कितना है आश्चर्य, नियति का
सीमाएँ गढ़ दीं असीम की,
सागर के भी तट होते हैं !
मन भी एक महासागर है
फिर लौटी हैं भाव तरंगें
कुछ प्रतिबंधित क्षेत्रों को छू !
आते-जाते तूफानों में
जाने कितनी दूर रह गईं
मेरे गीतों की नौकाएँ !
खामोशी का गहन समंदर,
दो द्वीपों पर मचे शोर का
कब तक साक्षी बना रहेगा ?