मंगलवार, 1 जनवरी 2019

जनम-जनम के अनुबंधों पर !!!

जनम जनम के अनुबंधों पर
हावी हो गई जग की रीत !
फिर सपनों के ताजमहल की
कब्र में सोई मेरी प्रीत !!!

मूरत तेरी गढ़ते जाना
पल-पल सूली चढ़ते जाना
कौन कसौटी, क्या पैमाना
ना यह जीना, ना मर पाना !

नियति डोर को तोड़ के आजा
मेरे मन के बिछुड़े मीत !
फिर सपनों के ताजमहल की
कब्र में सोई मेरी प्रीत !!!

मैंने तो पाषाणों से भी
बहते देखे हैं 'सोते' !
क्या मेरी पीड़ा पर अब भी
निष्ठुर नयन नहीं रोते ?

टूटे तार हृदय वीणा के,
बिखरा साँसों का संगीत !
फिर सपनों के ताजमहल की
कब्र में सोई मेरी प्रीत !!!

जिनको निभा नहीं पाए तुम,
काहे कर गए ऐसे कौल !
करते हैं उपहास मेरा अब
मेरे ही गीतों के बोल !

भावों के इस खेल में प्रिय,
मैं हार गई, ना पाई जीत !
फिर सपनों के ताजमहल की
कब्र में सोई मेरी प्रीत !!!



शनिवार, 22 दिसंबर 2018

मुस्कान में बदलो !!!

किसी की आँख के आँसू को 
तुम मुस्कान में बदलो !
दर्द को गीत में बदलो,
व्यथा को तान में बदलो !
जमाना साथ ना रोएगा
गर रोते रहोगे तुम !
रूदन बदलो हँसी में
वेदना को गान में बदलो !!!
किसी की आँख के.......

किसी का प्यार ना पाओ तो
खुद ही प्यार बन जाओ !
लगा लेंगे गले ईश्वर,
सुमन का हार बन जाओ !
तुम्हारे कर्म से तुमको
ये दुनिया याद रखेगी,
कि तुम हर काम को अपने
किसी अंजाम में बदलो !!!
किसी की आँख के.......

नहीं मिलता कोई माली
यहाँ जंगल के फूलों को !
नहीं करता क्षमा यह जग
कभी दूजे की भूलों को !
मगर नन्हा सा दीपक भी
अँधेरों से तो लड़ता है,
जगत के क्रूर भावों को,
दया के दान में बदलो !!!
किसी की आँख के.....

मिलेंगे और भी कारण
अगर लड़ना है, मरना है !
खुदा और ईश को, फिर क्यों
तुम्हें बदनाम करना है ?
मनुजता का पढ़ाते पाठ,
हों कुरआन या गीता !
हर इक हिंदू औ' मुस्लिम को
सिर्फ इंसान में बदलो !!!
किसी की आँख के.....

किसी की आँख के आँसू को तुम
मुस्कान में बदलो !
दर्द को गीत में बदलो,
व्यथा को तान में बदलो !!!



शनिवार, 15 दिसंबर 2018

शिशिर

भय से पीले पड़ गए,
तरुओं के सब पात।
काँटों सा तन में चुभे
शिशिर ऋतु का वात ।।

हुए दिगंबर वृक्ष ज्यों,
तापस त्यागे वस्त्र ।
हिमवृष्टि, ठंडी हवा,
शिशिर ऋतु के अस्त्र ।।

सूर्य ठिठुरता सा उगे,
चंदा करे विचार।
दीन दरिद्र कैसे सहें,
शिशिर ऋतु की मार ।।

मिलते श्रमिक-किसान को,
अल्पवस्त्र, अल्पान्न ।
उस पर तन को भेदता,
शिशिर ऋतु का बाण ।।

अन्न - धन की हो प्रचुरता,
प्रियतम का हो साथ ।
तब भलि लागे हर ऋतु
शिशिर, ग्रीष्म, बरसात ।