रविवार, 5 मार्च 2017

दूर जाना चाहते हो ?

दूर जाना चाहते हो ?
यूँ परायापन जताकर
क्यूँ रुलाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

अभी अभी तो शुरू हुआ है,
साथ चलना, सहप्रवास,
जरा देर पहले ही तो,
दे सहारा, थामा हाथ !
अब छुड़ाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

एक विनती मान लेना,
संग चलना उस क्षितिज तक,
देख लूँ नयनों से अपने,
मैं धरा से गगन मिलते...
लेख नियति ने लिखा यह,
क्यों मिटाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

साथ मेरा गर ना भाए,
तुम कदम आगे बढ़ाना,
मैं चलूँगी जरा पीछे !
पथप्रदर्शक ही रहो तुम,
पथ मेरा उज्जवल तो होगा !
प्यार की मासूमियत को,
आजमाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

यूँ परायापन जताकर,
क्यूँ रुलाना चाहते हो ?

बुधवार, 1 मार्च 2017

बिखरे सुमन


बिखरे सुमन.

जीवन की बगिया में,
संवेदनाओं के,
बिखरे सुमन !
कुछ हैं खयालों के,
कुछ भावनाओं के, 
बिखरे सुमन ।।

पेड़ों की शाखों से,
उलझी हवाएँ तो,
बरसी जो मौसम की,
पहली घटाएँ तो,
बिखरे सुमन !

जीवन की बगिया में,
बिखरे सुमन।।

उम्मीदें मिलने की,
खुशबू में लिपटे से...
डर है बिछड़ने का,
सहमे से सिमटे से,
बिखरे सुमन !

इक दिल ने दूजे से
की मौन बातें तो,
यादों की बरखा में
भीगी जो आँखें तो,
बिखरे सुमन !

जीवन की बगिया में
बिखरे सुमन ।

दिल उनका बोले,
सुने मेरी धड़कन ,
ये शब्दों के स्पंदन,
किए उनको अर्पण,
तो बिखरे सुमन !

जीवन की बगिया में
बिखरे सुमन।।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

जीवन - घट रिसता जाए है...

जीवन-घट रिसता जाए है...
काल गिने है क्षण-क्षण को,
वह पल-पल लिखता जाए है...
जीवन-घट रिसता जाए है ।

इस घट में ही कालकूट विष,
अमृत है इस घट में ही,
विष-अमृत जीवन के दुःख-सुख,
मंजिल है मरघट में ही !
जाने कितने हैं पड़ाव,
जिन पर मन रुकता जाए है...
जीवन घट रिसता जाए है ।

कभी किसी की खातिर भैया,
रुकता नहीं समय का पहिया,
चलती जाती जीवन नैया,
इस नैया का कौन खिवैया ?
बैठ इसी नैया में हर जन,
कहाँ पहुँचता जाए है ?
जीवन घट रिसता जाए है ।

युगों-युगों से रीत यही है,
जीना है आखिर मरने को,
जन्म नवीन, नया नाटक है,
नई भूमिका फिर करने को !
अगला अंक लिखे कोई तो,
पिछला मिटता जाए है....
जीवन - घट रिसता जाए है !
जीवन - घट रिसता जाए है ।।