मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

नशा - एक जहर


नशा - एक जहर


नशे की राह में कई गुमराह हो रहे,
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।

कहता है कोई पी के
भूल जाएगा वो गम,
कहता है कोई छोड़ दूँगा
आपकी कसम !
उज्जवल भविष्य कितनों के ही,
स्याह हो रहे....
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।

साँसों को जलाकर
बनाया खाक इन्होंने,
परिवार की खुशियों को
किया राख इन्होंने,
क्यों बेटियों के फिर भी
इनसे ब्याह हो रहे....
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।

हैं कौन वे जो बो रहे
नशे का ये जहर,
वे हैं भुजंग से भी बड़े
विषभरे विषधर,
इनकी वजह से जुर्म
बेपनाह हो रहे....
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।

कई तो फँसें जानकर
ये ऐसा जाल है,
अभिशाप है जीवन का,
ये अकाल काल है,
इसके शिकार लोग
सरेराह हो रहे....
क्यूँ नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ?

नशे की राह में कई गुमराह हो रहे,
ये नौनिहाल देश के तबाह हो रहे ।।

रविवार, 4 दिसंबर 2016

मैं और घड़ी


मैं और घड़ी 

घड़ी के काँटे
जीवन के पल - क्षण
सबमें बाँटें !

घड़ी की टिक - टिक
कहती है ना रुक
थकना मना !

इसके इशारों पर
चलती हूँ यंत्रवत
स्वयंचालित !

अब तो बने ज्यों
इक - दूजे की खातिर
मैं और घड़ी !

सुइयों से अपनी
बाँधकर लेती है
अनगिन फेरे !

वक्त की चेतावनी
ऋतु है मनभावनी
जाएगी बीत !

उनका है साथ जब
घड़ी - घड़ी फिर क्यूँ
घड़ी देखे !
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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

अब ना रुकूँगी !


अब ना रुकूँगी !

अब ना रुकूँगी !
बहुत रुक चुकी,
इस इंतजार में,
कि लौटोगे तुम तो साथ चलेंगे ।

डोर से कटी पतंग सी
कट चुकी, फट चुकी ये जिंदगी !
भागते-भागते उस
कटी पतंग के पीछे,
गुजरे दिन, महीने, साल !

चलो कोई नहीं,
अब तो लूट ही लिया उसे
आ गई है डोर हाथों में,
फटी ही सही, हाथ तो आ गई
पतंग जिंदगी की !

जोड़ भी लूँगी
विश्वास का गोंद मिल गया है,
हिम्मत की तीलियाँ भी हैं,
जोड़ ही लूँगी !

अब ना रुकूँगी,
बहूँगी नदिया - सी ।
मिलना हो तो पहुँचो, 
सागर किनारे !
अब वहीं मिलूँगी,
अब ना रुकूँगी !
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