नौकरी, घर, रिश्तों का ट्रैफिक लगा,
ज़िंदगी की ट्रेन छूटी, बस यूँ ही !!!
है दिवाली पास, जैसे ही सुना,
चरमराई खाट टूटी, बस यूँ ही !!!
डगमगाया फिर बजट इस माह का,
हँस पड़ी फिर आस झूठी, बस यूँ ही !!!
साँझ की गोरी हथेली पर बनी,
सुर्ख रंग की बेलबूटी, बस यूँ ही !!!
झोंपड़ी में चाँदनी रिसती रही,
चाँद कुढ़ता बाँध मुट्ठी, बस यूँ ही !!!
एक दीपक रात भर जलता रहा,
तमस की तकदीर फूटी, बस यूँ ही !!!
राह तक पापा की, बिटिया सो गई,
रोई-रोई, रूठी-रूठी, बस यूँ ही !!!
ज़िंदगी की ट्रेन छूटी, बस यूँ ही !!!
है दिवाली पास, जैसे ही सुना,
चरमराई खाट टूटी, बस यूँ ही !!!
डगमगाया फिर बजट इस माह का,
हँस पड़ी फिर आस झूठी, बस यूँ ही !!!
साँझ की गोरी हथेली पर बनी,
सुर्ख रंग की बेलबूटी, बस यूँ ही !!!
झोंपड़ी में चाँदनी रिसती रही,
चाँद कुढ़ता बाँध मुट्ठी, बस यूँ ही !!!
एक दीपक रात भर जलता रहा,
तमस की तकदीर फूटी, बस यूँ ही !!!
राह तक पापा की, बिटिया सो गई,
रोई-रोई, रूठी-रूठी, बस यूँ ही !!!