रविवार, 15 सितंबर 2024

तुम मेरे गीतों को गाना !

मनवीणा के, मौन स्वरों को
साथी, झंकृत करते जाना,
जब तक श्वासों में सरगम है,
तुम मेरे गीतों को गाना ।

इन्हें गाते गाते, नयन नम ना करना,
इन्हें गुनगुनाते सदा मुस्कुराना  !
ये सुरभित सुमन तुमको सौंपे है मैंने
हृदय के सदन में, इनको सजाना !
ये जब सूख जाएँ, इन्हें भाव से तुम
स्मृतियों  की गंगा में, साथी बहाना !
जब तक श्वासों में सरगम है,
तुम मेरे गीतों को गाना !
मनवीणा के, मौन स्वरों को
साथी, झंकृत करते जाना ।

धरोहर नहीं ये, नहीं कोष कोई,
इन्हें खर्च कर दो, इन्हें बाँट दो तुम !
नहीं पाश कोई, हैं ये नेह डोरी
जो लगते हों बंधन, इन्हें काट दो तुम !
है क्या इनका नाता तुम्हारे सुरों से,
कभी कोई पूछे तो उसको बताना !
जब तक श्वासों में सरगम है,
तुम मेरे गीतों को गाना !
मनवीणा के, मौन स्वरों को
साथी, झंकृत करते जाना ।









शनिवार, 24 अगस्त 2024

कभी हो समय तो...

मेरे टूटने की ना चिंता करो तुम,
हजारों दफा टूट कर मैं जुड़ी हूँ !
जुड़ी तो जुड़ी, जोड़ती भी रही जो, 
विधाता के द्वारा गढ़ी, वह कड़ी हूँ !

उन्हें तुम सँभालो,जो हैं नर्म-ओ-नाजुक
उन्हें प्यार दो, जो हैं झोली पसारे !
अगर मेरे दिल ने गलत कुछ किया है,
तो उसको कोई दूसरा क्यूँ सँभाले ?

नहीं दोष इसमें किसी का भी कोई
मैं सब छोड़, जाने कहाँ को मुड़ी हूँ !

ये हैं किस जनम के, बँधे कर्मबंधन
मेरी रूह ने कब लिए थे वो फेरे ?
मैं बेचैन, पागल, फिरी खोज में, पर
कदम-दर-कदम थे अँधेरे, घनेरे !

किसी मोह की डोर में यूँ उलझकर   
न फिर लौट पाई, ना आगे बढ़ी हूँ !

है ख्वाहिश, तुम्हें वह मिले तुम जो चाहो,
पहुँचती रहें तुम तलक सब दुआएँ !
सुकूँ-चैन, खुशियों की हो तुम पे बारिश,
मैं लेती रहूँ सब तुम्हारी बलाएँ !

कभी हो समय तो नज़र डाल लेना,
मैं सदियों से संग में तुम्हारे खड़ी हूँ !


बुधवार, 22 मई 2024

बीते बरबस, बरस संग के

तन का जब सौंदर्य रहे ना,
ना ही मन का यौक्न !
मूक, चहकती चंचल चिड़िया 
ताके सूखा उपवन ।
हृदय तुम्हारा तब भी होगा
क्या आतुर मिलने को ?
बीते बरबस, बरस संग के
रह गए दिवस गिनने को !

ना जाने क्यूँ बात - बात पर
भर आती हैं आँखें,
यादों के पंछी इस आँगन
गिरा गए फिर पांखें !
उतरेंगे वे बाग तुम्हारे
कल दाने चुगने को ।
बीते बरबस, बरस संग के
रह गए दिवस गिनने को !

कहीं दूर पर दीप नेह का 
टिमटिम कर जलता है,
प्रेम, परीक्षा देने से कब
घबराता, टलता है ?
थके हुए कदमों से भी
तत्पर हूँ मैं चलने को ,
बीते बरबस, बरस संग के
रह गए दिवस गिनने को !

जब मौसम मधुऋतु लेकर
लौटेगा, पुनः मिलेंगे !
हाथ तुम्हारा थामे, तब
जीवनभर संग चलेंगे।
अब जितना भी निभा सके,
उतने में खुश हो लेना,
रूठ ना जाना, छुपकर हमसे
तुम प्रतिशोध ना लेना। 
वृक्ष गिराता पत्र पुराने
नव पल्लव उगने को !
बीते बरबस, बरस संग के
रह गए दिवस गिनने को !