रविवार, 7 जनवरी 2024

मत पूछो !

किसने कितना साथ निभाया
मत पूछो !
कौन है अपना, कौन पराया
मत पूछो !

सबक दे गया मुझको
हर मिलने वाला,
किसने कौन सा पाठ पढ़ाया
मत पूछो !

जिसका जीवन जलता
जग की भट्टी में,
कैसे उसको जीना आया
मत पूछो !

चादर की लंबाई नाप 
ना पाया जो,
उसने कितना पग फैलाया,
मत पूछो !

सबको मालूम, दुनिया एक
सराय है !
देगा कितना, कौन किराया
मत पूछो !

फटते बादल, दरके पर्वत,
झुलसे जंगल !
क्यूँ कुदरत को गुस्सा आया
मत पूछो !


शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

जाड़े का एक दिन

अभी अभी तो जगा नींद से
अभी अभी फिर सो गया दिन !

कितना छोटा हो गया दिन !

जाड़े का ये कैसा जादू
सूरज पर है इसका काबू
शाल - दुशाले, दुलई - कंबल
ओढ़ के मोटा हो गया दिन !

कितना छोटा हो गया दिन !

रात ठिठुरती काँप रही है
गुदड़ी से तन ढाँप रही है
दिन होगा तो धूप खिलेगी
एक भरोसा हो गया दिन !

कितना छोटा हो गया दिन !

सूखे - सूखे आज नहा लो
पानी में तुम हाथ ना डालो
अदरक वाली गर्म चाय के
संग समोसा हो गया दिन !

कितना छोटा हो गया दिन !

सूरज भाई, कहाँ चला रे
काम पड़े हैं कितने सारे !
दुपहरिया के ढलते ढलते
किस कोने में खो गया दिन !

कितना छोटा हो गया दिन !

रविवार, 31 दिसंबर 2023

तज़ुर्बे ही सिखाते हैं....

करेंगे प्रेम जो तुमसे
तुम्हारे गम में रोएँगे,
तुम्हें गर नींद ना आए
भला वो कैसे सोएँगे।

नहीं हिम्मत, तुम्हें पूछूँ -
"दर्द का बोझ है कितना"
मिले जो दर्द के हिस्से
सभी खुद ही तो ढोएँगे।

बजाएँ चैन की बंसी
जो अपनों की मुसीबत में,
गुनाहों से सना दामन
वो किस गंगा में धोएँगे ?

मरी संवेदनाएँ हों दफ़न,
जिस दिल की धरती में
नहीं उगती फसल उसमें
बीज जितने भी बोएँगे। 

समंदर पार कर आए,
जरा सी दूर थी मंजिल
मगर सोचा ना था, कश्ती
किनारे ही डुबोएँगे। 

तज़ुर्बे ही सिखाते हैं
फ़लसफ़ा ज़िंदगी का ये
है अपना क्या जमाने में
जिसे पाएँगे - खोएँगे ।