एक मुद्दत बाद खुद के साथ आ बैठे
यूँ लगा जैसे कि रब के साथ आ बैठे !
कौन कहता है कि, तन्हाई रुलाती है,
हम खयालों में, उन्हीं के साथ जा बैठे।
वक्त, इतना वक्त, देता है कभी - कभी
इक ग़ज़ल भूली हुई हम गुनगुना बैठे।
लौटकर हम अपनी दुनिया में, बड़े खुश हैं
काँच के टुकड़ों से, गुलदस्ता बना बैठे ।
कोई कर लेता है कैसे, उफ्फ ! सौदा दोस्ती का
हम हलफ़नामे में, अपनी जाँ लिखा बैठे ।
एक अरसे बाद खोला, उस किताब को
फड़फड़ाते सफ़हे हमको, मुँह चिढ़ा बैठे।
छाँव में जिनकी पले, खेले, बढ़े,
उन दरख्तों पे क्यूँ तुम, आरी चला बैठे।