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बुधवार, 25 नवंबर 2020

एक मुद्दत बाद....

एक मुद्दत बाद खुद के साथ आ बैठे

यूँ लगा जैसे कि रब के साथ आ बैठे !


कौन कहता है कि, तन्हाई रुलाती है,

हम खयालों में, उन्हीं के साथ जा बैठे।


वक्त, इतना वक्त, देता है कभी - कभी

इक ग़ज़ल भूली हुई हम गुनगुना बैठे।


लौटकर हम अपनी दुनिया में, बड़े खुश हैं

काँच के टुकड़ों से, गुलदस्ता बना बैठे ।


कोई कर लेता है कैसे, उफ्फ ! सौदा दोस्ती का

हम हलफ़नामे में, अपनी जाँ लिखा बैठे ।


एक अरसे बाद खोला, उस किताब को

फड़फड़ाते सफ़हे हमको, मुँह चिढ़ा बैठे। 


छाँव में  जिनकी पले, खेले, बढ़े,

उन दरख्तों पे क्यूँ तुम, आरी चला बैठे।