शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

कुछ यूँ लगा जैसे....

छूकर मेरी पलकें मेरा सपना चला गया
कुछ यूँ लगा जैसे कोई अपना चला गया !

खाली पड़ा हुआ था, जो मुद्दत से बंद था
रहकर उसी मकान में मेहमां चला गया !

ले गया कोई हमें, हमसे ही लूटकर
इक अजनबी के संग दिल-ए-नादां चला गया !

आँखें तो कह रही थीं, रोक लो अगर चाहो
जाने के बाद फिर ये ना कहना - चला गया !

मंज़िल को ढ़ूँढ़ती रहीं कुछ गुमशुदा राहें
ना जाने कब, यहाँ से कारवां चला गया !

वो शौक, वो फ़ितूर, वो दीवानगी कहाँ ?
बारिश में भीगने का जमाना चला गया !

अब घोंसलों को तोड़कर बनते हैं घरौंदे
चिड़िया का इस शहर से आशियां चला गया !!!

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

काश ! ज़िंदगी कविता होती !

काश ! ज़िंदगी कविता होती !
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँटकर,
अपने हिस्से हम लिख लेते !!!

कभी-कभी ऐसा भी होता,
मेरी बातें तुम लिख देते
और तुम्हारी लिखती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !!!
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काश ! ज़िंदगी कविता होती !
लिखते-लिखते दिन हो जाता,
पढ़ते-पढ़ते रातें होतीं,
लफ्जों की ही धड़कन होती,
लफ्जों की ही साँसें होतीं।
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँटकर
अपने हिस्से हम जी लेते !!!

कभी- कभी ऐसा भी होता,
मेरी साँसें तुम जी लेते
और तुम्हारी जीती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !
^^^^^^^^^^^^^^^^^

काश ! ज़िंदगी कविता होती !
तुकबंदी करते-करते हम,
इक-दूजे की 'तुक' हो जाते,
मैं हो जाती एक अंतरा
और दूसरा तुम हो जाते।
थोड़ा-थोड़ा बाँट-बाँट कर
अपने हिस्से हम गा लेते !!!!

कभी-कभी ऐसा भी होता,
मेरा नगमा तुम गा देते
और तुम्हारा गाती मैं !
अगर ज़िंदगी कविता होती !!!
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काश ! ज़िंदगी कविता होती !!!

रविवार, 2 दिसंबर 2018

बंदिश लबों पे....

बंदिश लबों पे, लफ्जों पे पहरे बिठा दिए
अश्कों की हद में जख्म कुछ गहरे बिठा दिए।

है फासिला सदियों का हकीकत औ' ख्वाब में
अच्छा किया जो ख्वाब सुनहरे मिटा दिए।

सच ही कहा है वक्त को बेताज बादशाह
लोगों के वक्त ने असल चेहरे दिखा दिए।

एक ही गुलशन के गुल, किस्मत अलग-अलग
कुछ से सजे सेहरे, तो कुछ अर्थी सजा दिए।

बनकर नदीम लूटनेवालों का क्या करें
इंसानों को शतरंज के मोहरे बना दिए।

(नदीम - दोस्त/साथी)