मंगलवार, 7 नवंबर 2017

जब शरद आए !


ताल-तलैया खिलें कमल-कमलिनी
मुदित मन किलोल करें हंस-हंसिनी !
कुसुम-कुसुम मधुलोभी मधुकर मँडराए,
सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए !!!

गेंदा-गुलाब फूलें, चंपा-चमेली,
मस्त पवन वृक्षों संग,करती अठखेली !
वनदेवी रूप नए, क्षण-क्षण दिखलाए,
सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए !!!


परदेसी पाखी आए, पाहुन बनकर,
वन-तड़ाग,बाग-बाग, पंछियों के घर !
मुखरित, गुंजित, मोहित,वृक्ष औ' लताएँ,
सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए !!!

लौट गईं नीड़ों को, बक-पंक्ति शुभ्र,
छिटकी नभ में, धवल चाँदनी निरभ्र !
रजनी के वसन जड़ीं हीरक कणिकाएँ,
सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए !!!


सोमवार, 6 नवंबर 2017

नग़मों का आना जाना है !

बुननी है फिर आज इक ग़ज़ल
लफ्जों का ताना - बाना है !
तेरे दिल से मेरे दिल तक
नग़मों का आना जाना है !

कह भी दो, दिल की दो बातें
प्यार सही, तकरार सही !
बातों-बातों में बातों से
पागल दिल को बहलाना है !

वक्त ज़िंदगी कितना देगी,
तुम जानो ना मैं जानूँ !
सपनों में आकर मिल लेना
कुछ लम्हों का अफसाना है !

किससे सीखा ओ जादूगर,
पढ़ना अँखियों की भाषा  ?
खामोशी में राज़ नया कुछ
हमको तुमसे कह जाना है !

रूठ सको तो रूठे रह लो,
नहीं मनाने आएँगे अब !
इतना कह दो बिन बादल के
सावन को कैसे आना है ?

तेरे दिल से मेरे दिल तक
नग़मों का आना जाना है !

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

यह मनु-तन पाया
हर अंग बहुमूल्य,
सद्गुणों से बन जाए
तू देवों के तुल्य !
वाणी मणिदीप है,
तो बुद्धि है प्रकाश !!!

बोल क्या नहीं तेरे पास ?

देख उन सजीवों को
तू जिनसे बेहतर !
घुट घुटकर जीना है,
मरने से बदतर !
खींचकर निकाल दे,
मन की हर फाँस !

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

मानव का जन्म मिला
सबसे अनमोल,
हीरों को कंकड़ों संग
तराजू ना तोल !
सोच जरा, समझ जरा
क्यों है निराश ?

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

उठ सत्वर ! कर्म कर,
आलस को त्याग कर,
तपता, जलता है ज्यों
जगहित दिनकर !
कुछ स्व का, कुछ पर का,
किए जा विकास !

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?