परिभाषित प्रेम को कैसे करूँ,
शब्दों में प्यार कहूँ कैसे ?जो वृंदावन की माटी है,
उसको श्रृंगार कहूँ कैसे ?
प्रेम नहीं, शैय्या का सुमन,
वह पावन पुष्प देवघर का !
ना चंदा है ना सूरज है,
वह दीपक है मनमंदिर का !
है प्यार तो पूजा ईश्वर की,
उसको अभिसार कहूँ कैसे ?
परिभाषित प्रेम को कैसे करूँ,
शब्दों में प्यार कहूँ कैसे ?
नयनों का बंदी अश्रु प्रेम,
जिसको बहने की राह नहीं !
वह अतल हृदय की गहराई,
पाओगे उसकी थाह नहीं !
जो मीरा - श्याम का नाता है,
उसको संसार कहूँ कैसे ?
परिभाषित प्रेम को कैसे करूँ,
शब्दों में प्यार कहूँ कैसे ?
जब मन की सूनी घाटी से,
काँटों की राह गुजरती है !
तब हिय के कोरे कागज पर,
प्रियतम की छवि,उभरती है !
है प्रेम तो, नाम समर्पण का,
उसको अधिकार कहूँ कैसे ?
परिभाषित प्रेम को कैसे करूँ,
शब्दों में प्यार कहूँ कैसे ?