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मंगलवार, 29 सितंबर 2020

प्रकृति - गीत

दूर गगन इक तारा चमके

मेरी ओर निहारे,

मुझको अपने पास बुलाए

चंदा बाँह पसारे ।


पंछी अपने गीतों की

दे जाते हैं सौगातें,

वृक्ष-लता सपनों में आ

करते हैं मुझसे बातें ।


झरने दुग्ध धवल बूँदों से

मुझे भिगो देते हैं,

अपने संग माला में मुझको

फूल पिरो लेते हैं ।


कोयलिया कहती है मेरे

स्वर में तुम भी बोलो,

नदिया कहती, शीतल जल में

अपने पाँव भिगो लो ।


सारी पुष्प-कथाएँ

तितली-भौंरे बाँच सुनाते,

नन्हे-से जुगनू तम में

आशा की ज्योति जगाते ।


लहरें सागर की देती हैं

स्नेह निमंत्रण आने का,

पर्वत शिखर सदा कहते हैं

भूलो दर्द जमाने का ।


माँ की तरह प्रकृति मुझ पर

ममता बरसाती है,

अपने हृदय लगाकर मुझको

मीठी नींद सुलाती है।



गुरुवार, 11 जुलाई 2019

सावन


बोल पथिक ! क्या तेरे देस,
सावन अब भी ऐसा होता है ?
परदेसी बादल, वसुधा के 
नयनों में सपने बोता है ?

बाग-बगीचों में अब भी,
झूले पड़ते हैं क्या सावन के ?
गीत बरसते हैं क्या नभ से,
आस जगाते प्रिय आवन के ?

भोर सबेरे हरसिंगार
टप-टप हीरे टपकाते हैं क्या ?
माटी में मिलते-मिलते भी
सुमन सुरभि दे जाते हैं क्या ?

क्या भीगी-भीगी धरती का,
तन-मन रोमांचित होता है ?
बोल पथिक ! क्या तेरे देस,
सावन अब भी ऐसा होता है ?

क्या भैया की बाट जोहती,
हैं अब भी दो विह्वल अँखियाँ ?
पनघट पर कुछ हँसी ठिठोली,
करती हैं क्या गुपचुप सखियाँ ?

पीपल के नीचे मस्तों का,
जमघट अब भी लगता है क्या ?
बच्चों की टोली का सावन
जल में छप-छ्प करता है क्या ?

क्या त्योहारों पर हृदयों का,
अब भी वही मिलन होता है ?
बोल पथिक ! क्या तेरे देस,
सावन अब भी ऐसा होता है ?

क्या मोती की लड़ियाँ अब भी
झरनों से झर-झर झरती हैं ?
शिव की गौरी-सी ललनाएँ,
पूजाथाल लिए फिरती हैं ?

क्या कजरी-बिरहा में, रिमझिम
सावन की घुलमिल जाती है ?
क्या वंशी की धुन पर राधा
अब भी खिंची चली आती है ?

क्या अब भी कोई मेघ, यक्ष की
पाती ले जाते रोता है ?
बोल पथिक ! क्या तेरे देस,
सावन अब भी ऐसा होता है ?