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सोमवार, 16 सितंबर 2024

गणपति बाप्पा, मत जाओ ना !


( गणपति अपने गाँव चले, कैसे हमको चैन पड़े )

ग्यारह दिन ऐसे बीते हैं ,
जैसे बीते ग्यारह पल !
गणपति बाप्पा मत जाओ ना,
कहते होकर भाव विह्वल !

इंतजार फिर एक बरस का ,
हमको करना पड़ता है 
सुंदर सुंदर रूप तुम्हारे ,
तब कारीगर गढ़ता है ।
सबसे प्यारी सूरत चुनकर
अपने घर हम लाते हैं ,
तरह तरह के साज सजाकर
बप्पा तुम्हें मनाते हैं ।
कैसे करें विदा हम तुमको ,
हो जाते हैं नयन सजल !
गणपति बाप्पा मत जाओ ना,
कहते होकर भाव विह्वल !

कुछ ही दिन की खातिर बप्पा,
मेरे घर तुम आते हो !
मेरे सुख - दुःख के साथी,
इतने में ही बन जाते हो ।
अभी और भी कितने किस्से,
बप्पा तुम्हें बताना था 
लेकिन तुमको तो, जिस दिन
जाना था, उस दिन जाना था ।
अगले बरस जल्दी आओगे ,
सोच के यह मन गया बहल !
गणपति बाप्पा मत जाओ ना,
कहते होकर भाव विह्वल !

कैसे करें विदा हम तुमको ,
हो जाते हैं नयन सजल !
ग्यारह दिन ऐसे बीते हैं ,
जैसे बीते ग्यारह पल ! ! !


शनिवार, 31 दिसंबर 2022

साल नहीं बीतता है....

श्वास - श्वास, दिवस - मास
रीतते हैं हम,हाँ, रीतते हैं हम !
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !

बरखा में बूँद - बूँद कर, 
टपक रही है उम्र,
चुभती हवा में शिशिर की, 
सिहर रही है उम्र ।
फिर बसंत आगम पर 
रीझते हैं हम,
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !

जीना तो कहीं खो गया 
पाने की होड़ में,
जीवन था एक, बीत गया 
जोड़-तोड़ में ।
अब भी कहाँ
खुशियों का गणित 
सीखते हैं हम,
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !

कसमों से भरी टोकरी, 
वादों का पिटारा,
है अनुभवों की पोटली , 
यादों का पसारा ।
चंदन की तरह 
जग के लिए झीजते हैं हम !
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !

गिनते हैं लोग, 
उम्र के कितने बरस जिए,
गिनते नहीं, 
उधड़े हुए कितने जखम सिए ।
प्रेम की बरसात में, 
क्या भीगते हैं हम ?
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !!

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गुरुवार, 26 नवंबर 2020

स्वर्ण-से क्षण

स्वर्ण संध्या, स्वर्ण दिनकर

सब दिशाएँ सुनहरी !

बिछ गई सारी धरा पर

एक चादर सुनहरी !

आसमाँ पर बादलों में

इक सुनहरा गाँव है,

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


सोनपरियों-सी सुनहरी,

सूर्यमुखियों की छटा ।

पीत वस्त्रों में लिपटकर

सोनचंपा महकता। 

सुरभि से उन्मत्त होकर

नाचती पागल पवन !

पीत पत्तों का धरा पर

स्वर्णमय बिछाव है ।

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


सुनहरे आकाश से अब

स्वर्ण किरणें हैं उतरतीं ।

सुनहरी बालू पे जैसे

स्वर्ण लहरें नृत्य करतीं ।

पिघलता सोना बहे औ'

स्वर्ण - घट रीता रहे !

प्रकृति का या नियति का

यह अजब अभाव है।

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।


हैं हृदय के कोष में,

संचित सभी यादें सुनहली ।

और अँखियों में बसी है

रात पूनम की, रुपहली।

तुम मेरे गीतों को, जलने दो 

विरह की अग्नि में !

आग में तपकर निखरना

स्वर्ण का स्वभाव है। 

स्वर्ण-से क्षण, स्वर्ण-सा मन,

स्वर्ण-से ये भाव हैं ।

----- ©मीना शर्मा


गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

गीत उगाए हैं !!!

मन की बंजर भूमि पर,
कुछ बाग लगाए हैं !
मैंने दर्द को बोकर,
अपने गीत उगाए हैं !!!

रिश्ते-नातों का विष पीकर,
नीलकंठ से शब्द हुए !
स्वार्थ-लोभ इतना चीखे कि
स्नेह-प्रेम निःशब्द हुए !
आँधी से लड़कर प्राणों के,
दीप जलाए हैं !!!
मैंने दर्द को बोकर अपने....

अपनेपन की कीमत देनी,
होती है अब अपनों को !
नैनों में आने को, रिश्वत
देती हूँ मैं सपनों को !
साँसों पर अभिलाषाओं के
दाँव लगाए हैं !!!
मैंने दर्द को बोकर अपने....

नेह गठरिया बाँधे निकला,
कौन गाँव बंजारा मन !
जाना कहाँ, कहाँ जा पहुँचा,
ठहर गया किसके आँगन !
पागल प्रीत लगा ना बैठे,
लोग पराए हैं !!!
मैंने दर्द को बोकर, 
अपने गीत उगाए हैं !!!

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

एक कहानी अनजानी !

आँखों में बसा लो स्वप्न मेरा
होठों में दबा लो गीत मेरे !
बंजारे मन का ठौर कहाँ,
ढूँढ़ोगे तुम मनमीत मेरे !
बस एक कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

फूलों की खुशबू बिखरेगी,
तो बाग भी सारा महकेगा ।
धीमे से आना द्वार मेरे,
आहट से ये मन बहकेगा !
तुम मेरी कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

तारों में बीच में मत खोजो,
चंदा के गुमसुम मुखड़े को,
रूठे रहने दो आज मुझे,
मत खत्म करो इस झगड़े को !
फिर एक कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

नदिया के किनारे सूने क्यों,
क्यों सागरतट है वीराना ?
तुम जिद ना करो यूँ सुनने की,
जिद्दी लहरों का अफसाना !
अनकही, कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

मत क्षुद्र पतंगे - सा जलना,
नदिया-सागर सम मत मिलना !
धरती-नभ जैसे मिलकर हम,
रच लेंगे एक क्षितिज अपना !
हाँ, यही कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!

एक कहानी अनजानी
सीने में छुपाकर जी लेना !!!