गुरुवार, 15 जून 2023

प्रार्थनाएँ प्रेम की पर्यायवाची

याद करने के लिए कोई निशानी ढूँढ़ते हो,
और जीने के लिए गुजरी जवानी ढूँढ़ते हो,
भूल से भी भूल ना पाया तुम्हें जो,
तुम खतों में क्यों भला उसकी कहानी ढूँढते हो ?

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टाल दे जब बात को दीवानगी की,
छोड़ दे जब जिद कोई करना किसी से,
तब जरा सा झाँक लेना, पार पलकों के मुँदीं जो,
चल रहे होंगे वहाँ चलचित्र उस गुजरे समय के।

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बूझ लेना गूढ़तम भाषा मेरी अभिव्यक्तियों की,
और भावों की गहनतम तलहटी में उतर जाना ।
जो लगे मन के निकट, उस गीत को साथी बनाकर
सोच का जो उच्चतम होगा, शिखर वह खोज लेना ।

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नियति के बहुरुपिए के और कितने रुप बाकी,
छाँव कितनी भाग्य में है और कितनी धूप बाकी,
वक्त गर साँसों के धागों को उलझने से बचाता,
उम्र के टुकडों को सीकर एक चादर मैं बनाती ।

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और क्या दे पाएगा तुमको भला यह मन फकीरी,
बस दुआओं में बसी है हम फकीरों की अमीरी,
शब्दकोशों में कहाँ इस अर्थ को तुम पा सकोगे,
प्रार्थनाएँ सब मेरी हैं प्रेम की पर्यायवाची  !













रविवार, 22 जनवरी 2023

धूप

माघ की मरमरी ठंड को ओढ़कर,

धूप निकली सुबह ही सुबह सैर पर,

छूट सूरज की बाँहों से भागी, मगर

टूटे दर्पण-सी बिखरी इधर, कुछ उधर !


सूखे पत्तों पे कुछ पल पसरती रही,

धूप पेड़ों से नीचे फिसलती रही,

धूप थम-थम के बढ़ती रही दो पहर,

मिल के पगली पवन से सिहरती रही !


चाय की प्यालियों में खनकती रही,

गुड़ की डलियों में घुलकर पिघलती रही

खींचकर जब रजाई, उठाती है माँ,

धूप चादर में घुस कुनमुनाती रही !


गुनगुनी - गुनगुनी धूप उतरी शिखर,

स्वर्ण आभा से पर्वत को नहला गई,

नर्म गालों को फूलों के, सहला गई,

बस अभी आ रही, कह के बहला गई !


जिद की खेतों ने, 'रुक जाओ ना रात भर'

धूप अँखियों से उनको डपटती रही !

कुछ अटकती रही, कुछ भटकती रही,

हर कहीं थोड़ा - थोड़ा टपकती रही !


घास का मखमली जब बिछौना मिला,

खेलने को कोई मृग का छौना मिला,

साँझ आने से पहले ही वह खो गई,

बँध के सूरज की बाँहों में वह सो गई !


शनिवार, 31 दिसंबर 2022

साल नहीं बीतता है....

श्वास - श्वास, दिवस - मास
रीतते हैं हम,हाँ, रीतते हैं हम !
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !

बरखा में बूँद - बूँद कर, 
टपक रही है उम्र,
चुभती हवा में शिशिर की, 
सिहर रही है उम्र ।
फिर बसंत आगम पर 
रीझते हैं हम,
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !

जीना तो कहीं खो गया 
पाने की होड़ में,
जीवन था एक, बीत गया 
जोड़-तोड़ में ।
अब भी कहाँ
खुशियों का गणित 
सीखते हैं हम,
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !

कसमों से भरी टोकरी, 
वादों का पिटारा,
है अनुभवों की पोटली , 
यादों का पसारा ।
चंदन की तरह 
जग के लिए झीजते हैं हम !
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !

गिनते हैं लोग, 
उम्र के कितने बरस जिए,
गिनते नहीं, 
उधड़े हुए कितने जखम सिए ।
प्रेम की बरसात में, 
क्या भीगते हैं हम ?
साल नहीं बीतता है, 
बीतते हैं हम !!

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