रविवार, 29 सितंबर 2019

कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ?

कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ?
जिससे पहुँचे भाव हृदय तक,
मैं वह गीत कहाँ से लाऊँ ?

इस जग के ताने-बाने में
अपना नाता बुना ना जाए
ना जाने तुम कहाँ, कहाँ मैं
मार्ग अचीन्हा, चुना ना जाए !
बिन संबोधन, बिन बंधन 
मैं स्नेहपाश बँध जाऊँ !
कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ?

नियति-नटी के अभिनय से
क्योंकर हम-तुम विस्मित हों,
कुछ पल तो संग चले, 
बस यही सोच-सोच हर्षित हों !
कोई भी अनुबंध ना हो, पर
पल-पल कौल निभाऊँ !
कहो ना, कौन से सुर में गाऊँ ?

जाने 'उसने' कब, किसको,
क्यों, किससे, यहाँ मिलाया !
दुनिया जिसको प्रेम कहे,
वो नहीं मेरा सरमाया !
जाते-जाते अपनेपन की, 
सौगातें दे जाऊँ !
कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ? 

जिससे पहुँचे भाव हृदय तक,
मैं वह गीत कहाँ से लाऊँ ?


शनिवार, 27 जुलाई 2019

यथार्थ

मैंने अपने खून के कुछ 
कतरे बोए थे,
उनको सींचा था मैंने 
अपनी साँसों से
अपने ख्वाबों को कूट-काटकर
खाद बनाकर डाली मैंने !!!

उन कतरों को धीमे-धीमे 
बढ़ता देखा,
नन्हें-नन्हें हाथ पाँव 
उनमें उग आए,
मुस्कानों की, किलकारी की
फूट रहीं थीं शाखाएँ जब
तब मैंने इक बाड़ बनाई
नन्हा पौधा पनप रहा था !!!

सारे हक, सारी खुशियाँ, 
सारे शौकों को किया इकट्ठा, 
बाड़ बनाई,
हर आँधी में, हर तूफां में
दिया सहारा !!!

धीरे धीरे पौधा बढ़कर 
वृक्ष हो गया,
अब मेरे समकक्ष हो गया,
उसके अपने हमजोली हैं
उसका है अपना आकाश,
मिट्टी भी उसकी अपनी है,
आँधी तूफां में डटकर अब
कर सकता है स्वयं सामना,
नहीं बाड़ की रही जरूरत !!!

इक दिन कड़ी धूप में मैंने
उसकी छाया जब माँगी तो
उसने उसकी कीमत चाही
मेरी कमियाँ मुझे गिनाईं !
मेरे पैरों के नीचे की,
धरती भी अब तो उसकी थी !!!

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

सावन


बोल पथिक ! क्या तेरे देस,
सावन अब भी ऐसा होता है ?
परदेसी बादल, वसुधा के 
नयनों में सपने बोता है ?

बाग-बगीचों में अब भी,
झूले पड़ते हैं क्या सावन के ?
गीत बरसते हैं क्या नभ से,
आस जगाते प्रिय आवन के ?

भोर सबेरे हरसिंगार
टप-टप हीरे टपकाते हैं क्या ?
माटी में मिलते-मिलते भी
सुमन सुरभि दे जाते हैं क्या ?

क्या भीगी-भीगी धरती का,
तन-मन रोमांचित होता है ?
बोल पथिक ! क्या तेरे देस,
सावन अब भी ऐसा होता है ?

क्या भैया की बाट जोहती,
हैं अब भी दो विह्वल अँखियाँ ?
पनघट पर कुछ हँसी ठिठोली,
करती हैं क्या गुपचुप सखियाँ ?

पीपल के नीचे मस्तों का,
जमघट अब भी लगता है क्या ?
बच्चों की टोली का सावन
जल में छप-छ्प करता है क्या ?

क्या त्योहारों पर हृदयों का,
अब भी वही मिलन होता है ?
बोल पथिक ! क्या तेरे देस,
सावन अब भी ऐसा होता है ?

क्या मोती की लड़ियाँ अब भी
झरनों से झर-झर झरती हैं ?
शिव की गौरी-सी ललनाएँ,
पूजाथाल लिए फिरती हैं ?

क्या कजरी-बिरहा में, रिमझिम
सावन की घुलमिल जाती है ?
क्या वंशी की धुन पर राधा
अब भी खिंची चली आती है ?

क्या अब भी कोई मेघ, यक्ष की
पाती ले जाते रोता है ?
बोल पथिक ! क्या तेरे देस,
सावन अब भी ऐसा होता है ?