सोमवार, 6 जून 2022

तुमको पाती प्रिये....

तुमको पाती प्रिये, मैं कहाँ से लिखूँ ?
किसी ने मेरी, लेखनी छीन ली।

मेघ सुधियों के बेरुत  बरसने लगे,
ताल नयनों का बरबस छ्लकने लगा !
भीगने से डरी, मेरी निंदिया परी,
हर निशा, जागरण का महोत्सव हुआ।

घिर गई है तिमिर से हृदय की धरा,
प्रेम के चाँद की चाँदनी छीन ली। 
तुमको पाती प्रिये, मैं कहाँ से लिखूँ ?
किसी ने मेरी, लेखनी छीन ली।

पुष्प की पांखुरी, एक एक कर झरी
वृंत्त अब भी क्यों पौधे से आबद्ध है ?
नोंच पत्तों को पागल पवन पतझड़ी
कहती, शाश्वत भला कौन संबंध है !

अब बदलते हुए मौसमों ने यहाँ
कोकिलाओं से मधुरागिनी छीन ली !
तुमको पाती प्रिये, मैं कहाँ से लिखूँ ?
किसी ने मेरी, लेखनी छीन ली।

डालकर अस्त्र सारे, पराभूत हो, 
नेह का दीप बुझने को है अग्रसर !
किंतु मिटने से पहले क्षणिक मान में,
आस की लौ हुई थी जरा सी प्रखर !

स्नेह का अंत ही दीप का अंत है,
ज्योत कैसे जले, रोशनी छीन ली ।
तुमको पाती प्रिये, मैं कहाँ से लिखूँ ?
किसी ने मेरी, लेखनी छीन ली।


शनिवार, 30 अप्रैल 2022

हुड़दंग मत करो भई !

रंग मेरे बजरंग का 

बदरंग मत करो भई,

हनुमानजी के नाम पर 

हुड़दंग मत करो भई !!!


है अगर लड़ना तुम्हें

आतंकियों से तुम लड़ो

है अगर पढ़ना, तो पाठ 

प्रेमभाव का पढ़ो ।


मारुती को मत बनाओ 

तुम कभी बिचौलिया,

मानस में हैं बसे हुए 

भगवान राम औ' सिया ।


तुच्छ कार्य के लिए 

उपयोग ना उनका करो,

वीर के गुणगान का 

तुम यूँ निरादर ना करो।


तुलसी की मंजरी का 

दुरुपयोग मत करो भई !

हनुमानजी के नाम पर 

हुड़दंग मत करो भई !!!


रामबोला के हृदय की 

बेल जब फूली रही,

तब पवनसुत की कृपा से 

चालीसा सृजन भई ।


तुम चले अमृत कलश को 

रास्तों पर छींटने,

मोती मेरे तुलसी की 

माल के, चले बिखेरने ।


एक एक अक्षर है जिसका,

शक्तिमान बीज मंत्र !

कर रहे अपमान उसका 

कैसा है ये राजतंत्र ?


हनुमंत की स्तुति जरा 

हनुमंत को सुनाइए,

मन के कलुष धुल जाएँ

यदि राम को सुनाइए ।


गाने हैं गर विरोध में तो 

फिल्मी गीत गाइए,

बेहतर तो यही है कि 

बात प्यार से सुलझाइए।


पर... गीत रामदूत का 

बेढ़ंग मत पढ़ो भई।

हनुमानजी के नाम पर 

हुड़दंग मत करो भई !!!


रंग मेरे बजरंग का 

बदरंग मत करो भई

हनुमानजी के नाम पर 

हुड़दंग मत करो भई !!!

    किसी भी राजनीतिक गतिविधि से इस कविता का कोई लेना देना नहीं है। बचपन से ही हनुमान चालीसा का पाठ घर में करते और सुनते आए हैं और उसके प्रति मन में अपार सम्मान तथा श्रद्धा है जिसको यहाँ मैने अभिव्यक्त किया । महाकवि तुलसीदास जी की यह रचना सदैव ही मन में श्रद्धा एवं शक्ति का संचार करती रही है। 

 

शुक्रवार, 25 मार्च 2022

याद कहाँ रहता है हम दीवानों को !

काम नहीं आती है अक्ल मुहब्बत में,
याद कहाँ रहता है हम दीवानों को !

मौत खींचकर पास बुला ही लेती है,
जाना, जब जलते देखा परवानों को !

एक समय जो मंदिर - मस्जिद जाती थी,
राह वही जाती है अब मयखानों को !

सोच समझकर लफ्जों को फेंका करिए,
तीर नहीं आते फिर लौट कमानों को !

गुलशन के आजू - बाजू आबादी है,
कौन बसाया करता है वीरानों को  !

वक्त पड़े तो ले लेना हमसे हिसाब,
लिखकर रखना तुम अपने एहसानों को !

छोड़ गए जिनको मयकश भी, साकी भी,
वक्त भरेगा उन खाली पैमानों को !

दर्द, कराहों, आहों की आदत ऐसी,
जख्म भरे तो खुरचा गया निशानों को !