बुधवार, 7 जनवरी 2026

जानकर कौन भला, मोल इसे लेता है

जब भी मैंने कभी, दिल उसका दुखाया होगा
चोट का इक निशां, मेरी रूह पे आया होगा !

जानकर कौन भला, मोल इसे लेता है 
ये मुहब्बत का मर्ज़ खुद चला आया होगा !

मेरे दिल पर लगे, ज़ख्मों को अगर गिन पाओ
करो हिसाब  कि, कितनों ने दुखाया होगा !

अपनी आँखों के आँसुओं को, छिपाने खातिर
एक लतीफ़ा तेरी, महफ़िल में सुनाया होगा  !

मैंने इक हाथ से ये गीत लिखे उसके लिए
पर दुआ में तो, दोनों को उठाया होगा !

ख़ुदा गवाह, इबादत के कुछ लम्हों के सिवा,
एक पल के लिए , तुझको ना भुलाया होगा !

किसी जनम का कहीं, होगा बकाया कुछ तो,
बेसबब तो नहीं, कुदरत ने मिलाया होगा !






















5 टिप्‍पणियां:

  1. दी क्या कहे हर शेर दिल पर लग रही जानदार, शानदार, लाज़वाब गज़ल वाह्ह। दी आपकी रचनाओं की आत्मा महसूस की होती है सचमुच।
    सस्नेह प्रणाम दी।
    -----------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. वाह! वाह! मज़ा आ गया, मीना जी । हर शेर पर दाद देने का जी करता है ! अभिनंदन। नमस्ते ।

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