जब भी मैंने कभी, दिल उसका दुखाया होगा
चोट का इक निशां, मेरी रूह पे आया होगा !
चोट का इक निशां, मेरी रूह पे आया होगा !
जानकर कौन भला, मोल इसे लेता है
ये मुहब्बत का मर्ज़ खुद चला आया होगा !
मेरे दिल पर लगे, ज़ख्मों को अगर गिन पाओ
करो हिसाब कि, कितनों ने दुखाया होगा !
अपनी आँखों के आँसुओं को, छिपाने खातिर
एक लतीफ़ा तेरी, महफ़िल में सुनाया होगा !
मैंने इक हाथ से ये गीत लिखे उसके लिए
पर दुआ में तो, दोनों को उठाया होगा !
ख़ुदा गवाह, इबादत के कुछ लम्हों के सिवा,
एक पल के लिए , तुझको ना भुलाया होगा !
किसी जनम का कहीं, होगा बकाया कुछ तो,
बेसबब तो नहीं, कुदरत ने मिलाया होगा !
दी क्या कहे हर शेर दिल पर लग रही जानदार, शानदार, लाज़वाब गज़ल वाह्ह। दी आपकी रचनाओं की आत्मा महसूस की होती है सचमुच।
जवाब देंहटाएंसस्नेह प्रणाम दी।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
जवाब देंहटाएंवाह! वाह! मज़ा आ गया, मीना जी । हर शेर पर दाद देने का जी करता है ! अभिनंदन। नमस्ते ।
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंबहुत खूब
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