शनिवार, 3 जनवरी 2026

बिगड़े जो कभी बात तो...

व्यवहार बदल देते हैं औकात देखकर
मुंह फेर लेते, लोग हैं हालात देखकर !

रिश्तों की इस बाजार में , लगती हैं बोलियाँ
करते हैं लेन - देन, मोल - भाव देखकर !

मानक है यहाँ प्रेम का, बस देह का मिलन
तुम क्या करोगे , नयनों की बरसात देखकर !

वो भी चला गया है थाम हाथ किसी का
हँसते हैं लोग अब मेरे जज़बात देखकर !

वो छोड़कर चले, जो कभी हमकदम रहे
मेरी तबीयत को जरा, नासाज देखकर !

बिगड़े जो कभी बात तो आवाज लगाना
हम वो नहीं जो साथ दें खुशहाल देखकर !








9 टिप्‍पणियां:

  1. बिगड़े जो कभी बात तो आवाज लगाना
    हम वो नहीं जो साथ दें खुशहाल देखकर !
    वाह !!
    अद्भुत सृजन ।

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  2. वाह-वाह दी लाज़वाब गज़ल ,एक से बढ़कर एक शेर। दुनिया की यही सच्चाई है। गज़ब लिखा आपने दी।
    सस्नेह।
    सादर।
    -----
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ६ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. आदरणीय नुपूर जी, आदरणीय द्विवेदी जी, आदरणीय जोशी सर, आपका सभी का बहुत बहुत आभार !

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  4. बिगड़े कभी जो बात ... क्या बात है ! शानदार गज़ल

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