चिड़िया
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रविवार, 26 नवंबर 2017
बूँद समाई सिंधु में !
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प्रीत लगी सो लगि गई, अब ना फेरी जाय । बूँद समाई सिंधु में, अब ना हेरी जाय ।। हिय पैठी छवि ना मिटे, मिटा थकी दिन-रैन । निर्मोही के ...
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गुरुवार, 23 नवंबर 2017
प्रेम
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व्यंग्य के तीरों से भरे तरकश से निकला फिर एक नया तीर और उतर गया,सीधा उसके कलेजे में ! कलेजे में तो सिर्फ एक नया छिद्र हुआ, वहाँ क...
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रविवार, 19 नवंबर 2017
शहद है तू !
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मेरे जीने की वजह है तू जमाना हार, फतह है तू !!! मैं अँधेरों से नहीं डरती अब मेरी रातों की, सहर है तू !!! तेरे होने से मुकम्मल ह...
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