चिड़िया
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रविवार, 22 अक्टूबर 2017
खामोशियाँ गुल खिलाती हैं !
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रात के पुर-असर सन्नाटे में जब चुप हो जाती है हवा फ़िज़ा भी बेखुदी के आलम में हो जाती है खामोश जब ! ठीक उसी लम्हे, चटकती हैं अनगिनत कलि...
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मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017
एक दीप !
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एक दीप, मन के मंदिर में, कटुता द्वेष मिटाने को ! एक दीप, घर के मंदिर में भक्ति सुधारस पाने को ! एक दीप, तुलसी चौरे पर वृंदा सी शुचि...
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शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017
मेरे स्नेही सागर !
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मेरे स्नेही सागर ! दुनिया तुम्हें खंगालती होगी रत्नों की चाह में, गोताखोर लगाते होंगे डुबकियाँ मोतियों की आस में ! किंतु मैं तो दौड़...
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